Saturday, August 8, 2020

नवचेतना



संघर्षों के मध्य जूझकर लक्ष्य समन्वित पाना है ,
अमावस्या की सघन रात्रि तक दीपक हमें जलाना है ।
प्रखर पुरुषार्थ एवं श्रेष्ठ सेवा की,
नौका हमें बनानी है ।
जन जन के हृदय में अब ,
नवसृजन की ज्योति जलानी है ।

खो रही मानवता आज समाज ,
पर हमें धैर्य ना खोना है ।
नवाचार नित नवउमंग से ,
नवचेतन विकसित करना है ।

नवाचार की नई किरणें ,
जब धरा पर आती हैं ।
नित नूतन धरा में हर क्षण ,
उमंग संजोती जाती है ।

वायु निज नूतन बहे, बहे नीर की धार ,
भूमि नित नूतन सहे, सब जीवों के भार ।
कलरव करते पंछी प्रतिदिन, कहते हैं दिन रात ,
उठो मनुष्यों अब तो जागो, सृजन करो शुरुआत ।

©परीक्षित जायसवाल

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