#पहली__बार
मैं और मेरी माँ मुर्शिदाबाद के सुतार सिंह गली में एक टूटे फूटे हुए मकान में रहते थे, मैं दस साल का था और माँ चालीस की थीं,
वो तकरीबन हर रोज साड़ी और पीछे से हाफ कट वाला ब्लाउज पहनती थीं. मैं एक लोअर और टी-शर्ट में हफ्ता गुजारता था.
मकान में एक छोटा सा रसोई घर था. रसोई घर में एक स्टोव था और उसके ठीक बगल में मिट्टी का तेल था. तेल का डिब्बा हल्का हल्का टपकता था और तेल रिसता था.
माँ रोज बाहर काम करने जाती थीं. मैं रोज घर में बैठा-बैठा माँ के काम के खत्म होने का इंतजार करता था. माँ देर रात घर आती थीं और खाना बाहर से ही लाती थीं. रसोई घर ठंडा पड़ा रहता था.
मुझें खाने की भूख थीं मुझें खाने के अलावा कुछ नहीं सूझता था. माँ खाने समेत मुझें रसोई में छोड़ कमरे में चली जाती थीं.
दिन में कमरे में ताला लगा रहता था. चाभी माँ अपनी कमर में खोंस लेती थीं. मैं माँ के आने के बाद कमरे में कभी नहीं जाता था. माँ भी कमरे में जाने के बाद रसोई में नहीं आती थीं. घर में सन्नाटा पसर जाता था.
खाना खाने के बाद मैं रसोई में ही सो जाता था. सोने से पहले मुझें सपने नहीं आते थे. लेकिन मकान में लोगों की आवाजाही की आहट मुझें जरूर आती थीं.
देर रात में मुझें हर रोज सपने आते थे. मेरे सपने में कभी कोई परी, ताजमहल, चॉकलेट का डिब्बा और स्कूल नहीं आया.
मेरे सपने में रोज एक औरत आती थीं. औरत हर रोज बिस्तर पर तरह-तरह के मर्दो के साथ हम संग मिलती थीं. मैं सपने में शांत रहता था लेकिन वो खूब चीखती चिल्लाती थीं. मैं खाली पेट नहीं सोता था इसलिए मुझें दर्द नहीं होता था लेकिन उस औरत को बेतहाशा दर्द होता था. शायद वो बहुत भूखी थीं ऐसा लगता था उसे भूखा रखा जाता था. फिर एकदम सब शांत हो जाता था.
मैं सुबह जल्दी उठ जाता था. माँ देर से उठती थीं. मैं रसोई घर में आंखे खोले ही लेटा रहता था. मिट्टी का तेल रिसता हुआ मेरे लोअर को भिगो देता था. मैं उसे सुखाने के लिए कोई प्रयास नहीं करता था.
मैं स्कूल नहीं जाता था और मेरे कोई दोस्त भी नहीं थे. मैं बाहर खेलता नहीं था. माँ जब उठती और कमरे से बाहर आती थीं तो उनके बाल बिखरे होते थे. उनका चेहरा एकदम फूहड़ लगता था और उनकी साड़ी गन्दी नज़र आती थीं जिस पर कई जगह लाल धब्बे साफ झलकते थे. और उनकी वो हाफ कट वाली बलाउज पीछे से फुल कट वाली हो जाती थीं. ऐसा लगता था माँ बहुत खेल कूद कर बाहर आई हैं. शायद कमरे में कोई खेल का मैदान था. जो रसोई घर में नहीं हैं और इसलिए मैं खेल नहीं पाता.
माँ नहा धोकर काम पर चली जाती और मैं दिन भर घर पर पड़ा रहता था. कुछ रोज बाद माँ काम पर नहीं जाने लगी. और उसके कुछ रोज बाद माँ कमरे में ही पड़ी रहती. अब माँ खाना बाहर से नहीं लाती और मैं भूखा रहने लगा.धीरे धीरे माँ बहुत कमजोर होने लगी.
माँ बहुत ज्यादा कमजोर हो चुकी थीं इसलिए अब खेलती नहीं थीं और ना ही उनके बाल सुबह में बिखरे होते थे. उनके बदन पर एक ही साड़ी रोज़ रहने लगी.
अब मुझें सपने में वो औरत जो चीखती चिल्लाती थीं जिसे रोज ही दर्द होता था. एकदम शांत और कमजोर दिखाई देती थीं.
मैं और माँ दिन रात सोते रहते थे. माँ कमरे में सोती थीं और मैं रसोई घर में. मिट्टी का तेल रिस्ते रिस्ते मेरे लोअर को तर कर चुका था.
उस रात पहली बार माँ ने मुझें उस कमरे में बुलाया. जहाँ एक मैदान था और जिस मैदान में माँ रोज खेलती थीं. जब मैं उस कमरे में दाखिल हुआ तो कमरे में कोई मैदान नहीं था और ना ही कोई खेलने की चीज़ थीं.
कमरा एक चारपाई और गन्दी बदबू से भरा हुआ था. उस रोज माँ ने मुझें पहली बार गले लगाया, पहली बार मुझें माथे से लेकर मेरे पूरे बदन को चूमा, पहली बार मुझें अपनी गोद में सुलाया, पहली बार मुझें लाड प्यार किया. उस रोज सब पहली बार हुआ.
पहली बार माँ ने मुझें तकिए के नीचे से निकालकर एक गोली दी जो हमनें एक साथ खाई. पहली बार मुझें सोने के बाद कोई सपना नहीं आया.
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