Wednesday, December 1, 2021

welcome December

Welcome December
A month to remember
All that is gone
A hint of the new dawn

December, 
Fresh foods and bright sunshine
The time when everything seems so fine
As the hot cocoa melts with baked cakes 
The time when it's best to mend the heartbreaks 

December,
 A month to let go
To start with a new flow
Beginning of an end
Or maybe the twisted New year's bend

December, 
Arrival of the chilled winters
Awaiting the Christmas Star
Picnics, fairs and get-togethers for no reason
Carols, candles, the merry making festive season.

December, 
The dark nights, silent and lonely
Tucked up in blankets with the feeling so heavenly
The time of the year when books and tea are a must
It's also time to gear up for the next by deleting the past.

December,
Frosted emotions dries the eyes
The Iced hearts grew cold with all the lies
Time to make up or break through all that hurts
Time to renew and let all pains depart.

December,
The month of burning desire
The chilly wind adds spark to the bonfire
When lovers hold each other tight in their arms
The passionate lovemaking makes everything so warm.

December, 
The last time of the year
The season to let go all guilts and fear
The time to bring far ones close n near
The month to wish good luck to the ones so dear.

Tuesday, January 19, 2021

अंतर्मन

अंतर्मन

मैं बुरे वक्त का साथी हूँ 
यूँ ही बहती आवाज नही 
उलझनों में उलझी 
बस छोटी सी बात नही ।

अकेले हो जब जब तुम
हौसला मैंने बढ़ाया है 
अंधकार के इस भंवर से 
तुम्हे वापस लाया है ।

खोजती रहती है ये आंखे 
कुछ नया मिल जाये हर पल 
जी लूं जिंदगी बस ऐसे ही
हर नया पल और एक पल 

विघ्न सामने जो आती है
मन मानो घबरा जाती है
साथ हो दिल से अगर इसका 
चूर चूर हो जाती है ।

भय से भ्रांति और पतन से
जो नित निदान दिलाती है 
संघर्षो के मध्य जूझकर 
सत्य राह दिखलाती है ।

 कष्ट जिसे तुम कहते हो
निश्चित कसना जिसमे तुम्हे
मथ कर जैसे मक्खन
मिला है अवसर, अवश्य तुम्हें ।

 मैं अंतर्मन की आवाज हूँ
जो,हर जीव में बसता हूँ
हर एक निर्णय के क्षण 
सत्य उजागर करता हूँ 
मैं वही अंतर्मन की आवाज हूँ


..........................✍🏼

Saturday, September 5, 2020

शिक्षक और विद्यार्थी

"एक अच्छे शिक्षक का दावा"

सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ ।
नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ ।
चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी,
तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ।
समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के,
और मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ।
बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा,
अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ।

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"अच्छे शिक्षक से एक स्टूडेंट का निवेदन"

मुझे अल्हड़ता से गाने दो, 
क्यों अपना साज बनाते हो?
मैं पिय का प्रेम पपीहा हूँ, 
मुझको क्यों बाज़ बनाते हो?

कुदरत ने कंठ दिये मुझको,
अपने ही सुर में गाने को,
तुम मेरे गीत बदलकर क्यों
अपनी आवाज बनाते हो?

मैं ना मिट्टी का लौंधा हूँ 
और ना ही कोई पत्थर हूँ,
मैं तो आज़ाद परिन्दा हूँ, 
मुझको क्यों ताज़ बनाते हो?


Friday, August 28, 2020

"एक अच्छे शिक्षक का दावा"

"एक अच्छे शिक्षक का दावा"


सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ ।

नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ ।

चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी,

तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ।

समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के,

और मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ।

बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा,

अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ।


--------------------------------------------------


"अच्छे शिक्षक से एक स्टूडेंट का निवेदन"


मुझे अल्हड़ता से गाने दो, 

क्यों अपना साज बनाते हो?

मैं पिय का प्रेम पपीहा हूँ, 

मुझको क्यों बाज़ बनाते हो?


कुदरत ने कंठ दिये मुझको,

अपने ही सुर में गाने को,

तुम मेरे गीत बदलकर क्यों

अपनी आवाज बनाते हो?


मैं ना मिट्टी का लौंधा हूँ 

और ना ही कोई पत्थर हूँ,

मैं तो आज़ाद परिन्दा हूँ, 

मुझको क्यों ताज़ बनाते हो?


©परीक्षित

बिलासपुर छत्तीसगढ़

Thursday, August 27, 2020

Just_be_in_the_present

#Just_be_in_the_present
(Trying to....)

Yes , it's important to tell my heart
Since I started Thinking

Yes the time begins
& I'm the beginner

Just trying to....
Create myself encompassing
Practice with patience

Integrate myself comprising
Passion and persistence

Glowing up the mind with
Dedication nd Determination

Formulating my habit considering
Discipline nd devotion

Regulate the soul nd mind
With dare and distinction

Maintaining the strategies
With Speed and Accuracy

Yes ....All humans are the beginners
All are students
All are son of God
Who teach us every second of life

The only thing is to
Observe nd accept the truth
i.e. Learning

Remember
Integrity is everything.....

And we must integrate ourself
By putting the limits
From *zero to unity*
The perfection is the variable
Depends upon our work

And Practice is the integrating factor
This will results a better answer
Of life......

Tuesday, August 25, 2020

कुछ पुरानी यादें

कुछ पुरानी य़ादे :-

वो पुरानी कॉपी....
सहेजे हुए है ना जाने राज़ कितने....
आखिरी पन्नो पर लिखे हुए कुछ नाम...
जिनका आज जीवन से कुछ वास्ता नही....,
सबकी अलग मंजिल अब एक रास्ता नही ...
वो कुछ पुराने खेल..... गाने की पंक्ती ...
जीवन तो उस कॉपी मे था अब अलग है ज़िन्दगी....

वो पुरानी किताब.... जिसमे आज भी रखा है गुलाब का वो सूखा हुआ फूल....
ये फूल भी अपनी एक अलग कहानी कहता है...
उडे हुए रंग....,सूखी बिखरी पंखुडियो की जुबानी कहता है....
ये आज भी बताता है कि मुझे इससे कितना प्यार था...
ये किसी की निशानी नही...बचपन से मेरी खुशियो का राजदार था....

वो छोटी सी गुडिया ....
शायद आज भी मेरा इंतजार करती होगी....
बहुत समय से उसे नए कपडे नहीं पहनाये....
उसका जन्मदिन नही मनाया ....
अब तो ना जाने घर के किस कोने मे पड़ी मेरी रह तकती होगी...
रोते हुए भी उसे देखकर मैं मुस्कुरा देता था....
उससे कितनी बाते किया करता था....
पता ही ना चला वो कब मुझसे अलग हो गई...
वो तो आज भी वैसी ही है ...शायद मैं ही बड़ा हो गया..

पुराने दोस्तो की भीड ना जाने कहाँ गुम हो गई...
अरे अभी तो सब यही थे ....लगता है शायद स्कूल की छुट्टी हो गई....
मेरे साथ लुका छिपी खेल रहे हो क्या... या फिर ये कोई मज़ाक है...
वापस तो आओ य़ारो अभी बाकी बहुत हिसाब है...

जानता हूँ ये य़ादे वापस नही आयेंगी....
पर कोई बात नहीं...इन य़ादो को याद करने का भी एक अलग ही मज़ा है...
पर इन य़ादो मे अपना समय नही गवाँउगा ...
लेकिन तुम लोगो को भी याद जरूर दिलाऊगा....
अभी तो बहुत ज़िन्दगी बाकी है... चलो और य़ादे बनाते हैं...
आगे की ज़िन्दगी के लिए थोडी और शैतानियाँ सजाते है ...

"लफ़्ज़ों के मोती"

~परीक्षित जायसवाल

Sunday, August 23, 2020

नवोदय एक सफ़र

"नवोदय एक सफर" 

नवोदय विद्यालय में भी हॉग्वार्टज़ की तरह विद्यार्थियों को चार अलग-अलग हाउस में बांटा जाता है, 
गरुड़द्वार, नागशक्ति, मेहनतकश, चीलघात की तरह अरावली, शिवालिक, नीलगिरी एवं उदयगिरि ।
लिहाजा नवोदय में यह निर्णय बोलती टोपी नहीं करती,
पर एक बात जरूर है कि सभी हाउस की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं, जो उस हाउस में रहने वाले विद्यार्थी आदिकाल से उस परंपरागत विशेषता का कड़ाई से अनुपालन करते हैं ।
किसी हाउस में टॉपर्स, किसी में खिलाड़ी और किसी हाउस में आज्ञाकारी होने के लक्षण पाए जाते हैं ।
परन्तु एक हाउस ऐसा जरूर होता है, जो इन सभी शब्दों से ऊपर उठकर निर्वाण को पा चुका होता है ।

नवोदय में पहला दिन पूरा होने के उपरांत अगले दिन प्रातःकालीन प्रार्थना में हम सभी उपस्थित हुए,
प्रार्थना के उपरांत हमारा अभिवादन प्राचार्य महोदय ने डंबलडोर की भांति किया,
प्रातःकालीन प्रार्थना का हर एक नवोदयन के जीवन में विशिष्ट महत्व होता है, लिहाजा नवोदय में रहते हुए प्रार्थना के शब्दों के मूल भाव को हम पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाते,
परंतु आज यदि हम नवोदय प्रेयर के हर्फ़ों की ओर अपनी निगाहें दौड़ाए तो पाएंगे कि उन चंद शब्दों में कितना कुछ समाया हुआ है :-

"रंग जाति पद भेद रहित
हम सबका एक भगवान हो
संतान हैं धरती माँ की हम
धरती पूजा स्थान हो
धरती पूजा स्थान हो"

कुछ ही शब्दों में जिंदगी के नैतिक मूल्यों का परिचय कराने वाली प्रार्थना, आज के दौर में हमें समझने की अत्यधिक आवश्यकता है, जब हम जातिवाद के नाम पर आपस में लड़ रहे हैं ।

प्रार्थना पूरी होने पर प्लेज, न्यूज़, जी.के के साथ अन्य गतिविधियों का साक्षात्कार करना मेरे जैसे ग्रामीण परिवेश से आए विद्यार्थियों के लिए अनूठा अनुभव रहा..

प्रार्थना के उपरांत हमारा सेक्शन डिवाइड किया गया,
सभी को एक कतार में खड़ा कर "ए" और "बी" सेक्शन के लिए वर्गीकृत कर लिया गया,
मुझे "ए" सेक्शन मिला परंतु "सुधा रतावल" को "बी"सेक्शन,
कभी-कभी प्रेम अपने शुरुआती स्थिति में ही दम तोड़ देने जैसी परिस्थिति से गुजरता है, 
यह स्थिति मेरे लिए कुछ वैसी ही थी...
प्रार्थना के उपरांत कक्षा लौटने पर हमारा स्वागत थवाईत मैडम ने किया, जो विज्ञान की शिक्षिका थी...
थवाईत मैडम "नवोदय के सफर" में मेरी पसंदीदा शिक्षिकाओं में से एक थी, 
मुझे विज्ञान विषय में बेहद रुचि थी एवं मैडम का पढ़ाने का अंदाज भी निराला था ।
मुझे आज भी याद है कि मैंने अपने पहले यूनिट टेस्ट में विज्ञान विषय में पूरे अंक(40/40) अर्जित किए थे,
जी नहीं शो-ऑफ नहीं कर रहा हूँ, 
यह मेरी यादगार मेमोरी में से एक है, जो मैं अब तक नहीं भूल पाया हूँ । 
विज्ञान की कक्षा के अलावा अन्य विषयों की कक्षाएं भी प्रारंभ हो गई, 
मुझे आज भी हिंदी की वह पहली कक्षा याद है...
जब त्रिपाठी सर ने अपने अंदाज में कविता पाठ किया था ।
हिंदी भी मेरी पसंदीदा विषयों में से एक थी...

#मेरी_आपबीती 
पहले हमने क-ख-ग सीखा फिर बाद में पढ़ीं कविताएँ, कविताओं से तब से ही इश्क़ हैं हमें ।

अधिकांश कक्षा की शुरुआत में अध्यापक सभी विद्यार्थियों को अपना परिचय देने के लिए कहते..
जो मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होता था, 
अपनी बारी आने से पहले मैं मन ही मन दसों बार कुछ लाइंस रिपीट करता था
(my name is..... I am from.... I Scored.....)

मुझे लगता है की उस उम्र में यह सभी के लिए स्वभाविक होता है,
देखते ही देखते नवोदय विद्यालय में मेरा पहला सप्ताह बीतने लगा, मुझे आने वाले रविवार का बेसब्री से इंतजार था, क्योंकि मम्मी-पापा मुझसे मिलने आने वाले थे ।
इतना उतावला उनसे मिलने के लिए मैं पहले कभी नहीं हुआ था... 
ऐसा लग रहा था मानो मैं उनसे वर्षों के बाद मिलने वाला हूँ,
मेरे मन में उत्सुकता का सैलाब उमड़ रहा था, उनका स्वागत करने की तैयारी में मैंने अपने बिस्तर को सुव्यवस्थित कर लिया था, बेड के आसपास की सफाई भी कर ली थी ।
मेरा उमंग पल-पल बढ़ता जा रहा था,
मैंने अपने आपको इतना खुश पहले कभी नहीं पाया था..
मैं हाउस से निकल ही रहा था की सहसा एक आवाज़ आई परीक्षित...... 

मेरी निगाहें उस और गई तो पाया कि वहां पर आशीष भैया थे, 
उन्होंने मुझसे पूछा... बाहर जाएगा क्या..?
पहले मैं उनका आशय समझ नहीं पाया, फिर मालूम हुआ कि नवोदय विद्यालय के नियमों के अनुसार बाहर जाने के लिए आपको अपने सदन अध्यक्ष से अनुमति लेनी होती है,
मैंने हामी भर दी ।
उसके बाद हम नाश्ता करने के लिए साथ गए, नाश्ते में रविवार के अवसर पर पूड़ी एवं आलू की सब्जी होती थी, पूड़ी जैसे स्वादिष्ट व्यंजन के लिए लाइन की लंबाई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं, 
जो लंबी कतारें कोरोना संकट काल में मैखानों के खुलने पर लगी थी.. 
अपनी बारी का इंतजार मुझे बेसब्री से था,
परंतु कुछ सीनियर लाइन के बीच में घुसकर अनुशासनहीनता का परिचय देते हुए नज़र आए, उनका यह व्यवहार मुझे पसंद नहीं आया... 
अपनी बारी आने पर मैं नाश्ता लेकर भैया के साथ एक स्थान पर जाकर बैठ गया, भैया ने अपनी पूड़ियाँ मेरे प्लेट पर उड़ेल दी, मुझे कुछ समझ नहीं आया...
फिर उन्होंने मुझे उनका इंतजार करने के लिए कहा, 
थोड़ी ही देर में वो लौटे, उनके प्लेट में और पुड़ियां थी... 
उनसे यह राज जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि यह डबल मारने की कला है... 
जो सभी नवोदयन के लिए पूड़ी खाने की अपनी इच्छा तृप्ति को पूरा करने का जरिया होता है,
इसके लिए अथक परिश्रम और दृढ़ निश्चय की आवश्यकता होती है... 
जैसे दोबारा पूड़ी लेने से पहले थाली को अच्छे से धोना, या अपने बालों का अंदाज बदल लेना इत्यादि... 
मुझे एक फायदा जरूर हुआ कि मुझे पेट भर पूड़ी खाने को मिल गया... 
वापस हाउस लौट कर हम तैयार हुए और कुछ अन्य सहपाठी के साथ मिलकर अपने हाउस मास्टर के पास अनुमति लेने गए, 
अनुमति मिलने पर सबके चेहरे की मुस्कान देखने लायक थी, मुझे भी बाहर जाने की स्वच्छंदता की खुशी का एहसास धीरे-धीरे होने लगा..
नवोदय के गेट के बाहर कदम रखना एक अलग ही एहसास होता है, आप स्वच्छंद हो जाते हैं, बिल्कुल पंछियों की भांति...
बाहर भी ज्यादा दुकानें नहीं थी, पर जो स्वतंत्रता की खुशी थी, वह अन्य चीजों में मयस्सर कहां...
हम सभी ने अपनी जरूरतों की सामग्री के साथ-साथ खाने पीने की ढेर सारी चीजें ली... 
खिमेश भैया की दुकान नवोदय के गेट के ठीक सामने थी, हमारा अभिवादन उन्होंने ऐसी मुस्कान के साथ किया मानो उनकी दुकान चलने का पूरा जिम्मा हम नवोदयन के कंधों पर ही टिका हुआ है...
खरीदारी करने के बाद हम सभी "साहू होटल" जो वहां पर एकमात्र होटल था, की ओर बढ़े, मैं अपने साथ ज्यादा रुपए लेकर नहीं आया था, इसलिए मेरे पैसे किराना में ही खर्च हो गए थे....
परंतु होटल के लजीज समोसे देखकर मेरी जीवा में लालच आ गया...
हम सभी एक टेबल पर बैठ गए, मैं अभी भी इस बात पर पछतावा कर रहा था की मैं अधिक रुपए लेकर क्यों नहीं आया....
तभी भैया ने होटल वाले को आवाज लगाई और सभी के लिए समोसे लगाने को कहा.. 
मैंने उन्हें मना करने की कोशिश की पर वह नहीं माने, और कहा कि यहां के समोसे बेहद लजीज है...
मैं उन्हें अपनी तंग स्थिति से अवगत करा पाने में असमर्थ था, मैंने हामी भर दी...
नाश्ता करने के बाद बिल चुकाते समय उन्होंने मेरे कहे बगैर मेरी बिल का भुगतान कर दिया...
वैसे तो वह राशि बड़ी नहीं थी पर मेरे मन में नवोदय के सीनियर्स को लेकर स्नेह बढ़ गया.. 
हम सभी खुश थे अपनी इस आजादी पर, कुछ समय हमने टहलते हुए बिताया और फिर वहीं चौपाल पर बैठ गए... हमें वहां पर बैठे कुछ लम्हें बीते थे की वहां पर बांसुरी वाले भैया भी आकर बैठ गए... और बांसुरी बजाने लगे मुझे अपने पहले दिन की यादें एक बार फिर ताजा हो गई...
उनकी सुरीली तान सुनकर हम सभी प्रसन्न थे, 
उस दिन मैंने पहली बार स्वछंदता का अनुभव इस प्रकार किया था...
फिर हम वापस अपने हाउस लौट गए...
परन्तु वापस आकर भी मेरी बेसब्री, अपने मम्मी-पापा के इंतजार में बरकरार थी....
उस समय यदि मेरे पास कोई विकल्प रख देता....
आपको मैजिक पेंसिल चाहिए या आज मम्मी पापा से मिलना है...
मैजिक पेंसिल जो शायद मेरा पहला प्यार है, उस दिन मैं उसका भी तिरस्कार कर देता....
मैंने कुछ देर आराम किया और एक बार फिर अपने सामान को व्यवस्थित कर लिया,
सहसा मार्को भैया दौड़ते हुए आए और मुझसे कहा..
परीक्षित तेरे मम्मी-पापा आ गए, इस छोटे से वाक्य ने मेरे अंदर डोपामाइन की बाढ़ ला दी और मैं खुशी की चरम सीमा का अनुभव करने लगा... 
जीवन की भागदौड़ में खुशियों की तलाश करते हुए हम अपनों से दूर होते जा रहे हैं, हमारा एकमात्र लक्ष्य रुपए कमाने तक सीमित रह गया है, हम केवल बाहरी आडंबर में खुशियां तलाशने की कोशिश में रहते हैं... 
जहां खुशियां हैं ही नहीं, खुशी का सरोकार लग्जरी और साधनों से कदाचित भी नहीं है,
यदि आप किसी इंसान के साथ कुछ पल ठहर कर,
उस लम्हे को खुलकर जी सकते हैं, तभी आप खुशी की चरम सीमा को पा सकते हैं...
खुशियां बहिर्मुखी नहीं अंतर्मुखी होती हैं...

मम्मी-पापा के आने की खबर भैया से मिलते ही मानो मुझे पर लग गए, शक्तिमान की गति से मैं गेट की ओर दौड़ पड़ा..
हाउस के ठीक बाहर आने पर मुझे अपने मम्मी-पापा और छोटा भाई दिखलाई दिए.. 
मैं उस पल को अपने शब्दों में पिरो सकूँ, ऐसा मंजा हुआ लेखक नहीं, बस यह कह सकता हूं कि एक पल के लिए मैं अपनी सारी परेशानियां, जो मुझे नवोदय में रहते हुए उठानी पड़ी थी, वह भूल गया था...
हम लोग हाउस में आ गए, मम्मी-पापा को देखकर मार्को भैया ने अभिवादन किया, मैं कुछ पल के लिए खामोश रहा फिर अपने द्वारा मंगाए गए सामग्री का मैंने जिक्र किया, जिसमें कुछ स्टेशनरी आइटम, शतरंज खाने-पीने की वस्तुएं और अन्य चीजें थी...
तभी मम्मी ने कहा, सामान बाद में देखना पहले खाना खा लो, मुझे भी टिफिन देख कर उसके अंदर लजीज व्यंजन के स्वाद की अनुभूति होने लगी, नवोदय में खाने का स्तर अच्छा ना होने की वजह से मैं घर के खाने को बहुत याद करता था...
आज मुझे एक बार फिर घर के खाने का स्वाद मिलने वाला था, टिफ़िन खोलने पर मैंने पाया कि मेरी पसंदीदा टमाटर की चटनी और चावल की पुड़ियां थी..
मैं उस पर एक टूटने ही वाला था कि पापा ने कहा भैया को भी बांट दो, मैंने भैया को भी पुड़ियां दी, यह मेरे नवोदय जीवन में साझा करने का पहला अनुभव था...
पुड़ियों का स्वाद लेने के बाद मैं घर से आए सामग्रियों की तहकीकात करने लगा... वॉटर कलर, पेंसिल, शतरंज, डायरी और बहुत कुछ...
पर उनमें सबसे अनोखी चीज जो मैंने देखी... "हैंड ग्लव्स" जो पापा ने बताया कि मेरी कज़न दीदी ने अपने हाथों से बनाए हैं, यह देख कर मेरा दिल पसीझ गया...

रिश्तो की अहमियत हमें दूर होने पर ही समझ आती है, सदैव नजदीक रहने पर हम उन भावनाओं की कद्र करना भूल जाते हैं...
दीदी का मुझ पर स्नेह देख कर मैं बेहद खुश था, मुझे यह तोहफा बेहद अनमोल प्रतीत हुआ... उसके साथ-साथ पापा मेरे लिए अलग-अलग स्याही की कलम, और विविध प्रकार के अचार लाए थे...
मैं सारी सामग्री अपने बक्से में सजाने में लग गया, फिर बातों के सिलसिले में पता ही नहीं चला और 2 घंटे बीत गया, मैंने मम्मी को अपना डेली-रूटीन बताया और नवोदय प्रेयर की कुछ लाइंस जो मुझे याद थी वह सुनाया.....
उसके बाद हम कैंपस में टहलने के लिए निकल पड़े.. रविवार का दिन नवोदय में एक उत्सव होता है 
क्योंकि बहुतायत विद्यार्थी के मम्मी-पापा उनसे मिलने रविवार को ही आते हैं, और वह दिन इसलिए भी खास होता है क्योंकि हमें अपने अनुशासित डेली-रूटीन से 1 दिन की मोहलत मिल जाती है...

कितना अच्छा होता है ना जिंदगी में कुछ पलों का यूं बेसब्री से इंतजार करना और वह पल आने पर उस पल को खुल कर जी लेना...
आज की भाग-दौड़ में हम सभी अपना लक्ष्य निर्धारित करते हैं परंतु वह पा लेने पर भी हम उस पल को खुलकर नहीं जी पाते.... हम एक नया लक्ष्य निर्धारित कर चुके होते हैं,
अक़्सर हम देखते हैं जब बारिश होती है सभी अपने आप को बारिश से बचाने का प्रयास करते हैं और अगर असमय बारिश हो जाए तो उस पर नाराजगी भी जताते हैं...
पर आपने कभी किसी छोटे बच्चे को खुद को बारिश से बचाते ना देखा होगा, बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस करने के लिए अपनी हथेलियों में पानी भरकर खुद पर छींटे मारता है, वह कभी बारिश का स्वागत निराश होकर नहीं करता...
बारिश उसके लिए उत्साह का प्रेरक होती है, 
हमारी जिंदगी में संभावनाएं या परेशानियां भी बारिश की ही तरह है... जितना हम उससे दूर भागेंगे, हम अपने आप को दुखों के सागर में डूबता हुआ पाएंगे...
बच्चों की तरह उसका खुलकर स्वागत करना ही इसका उपाय हैं.... कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात कहूँगा....

"खाई है कसम अब खुद को बिलकुल नहीं बचाएंगे,
खाई है कसम अब खुद को बिलकुल नहीं बचाएंगे,
बारिश हो तो सही,
अरे! बारिश हो तो सही, हम ज़रा क्या पूरा भीग जायेंगे।"

लगता है ज्ञान की बातें कुछ ज्यादा हो गई, 
संस्मरण में ज्ञान की अति के लिए माफी चाहूंगा...
मैंने मम्मी-पापा को अपना कैंपस दिखाया, जिसमें अकादमिक बिल्डिंग, मैदान, मंदिर और दुकान शामिल है, देखते ही देखते समय बीत गया और मम्मी पापा के लौटने का समय हो गया, मैं उनके साथ में बाहर चौपाल पर आकर बैठ गया..
हमें वहां बैठे कुछ लम्हे बीते थे कि बांसुरी वाले भैया की आवाज सुनाई दी.. मैंने अपने आपको नवोदय के पहले दिन और आज के दिन के बीच असमंजस में पाया,
क्या आज मेरा पहला दिन ही है..?
मेरी याददाश्त कुछ पल के लिए बांसुरी के धुन में खो गई, थोड़ी देर में बस आ गई तब पापा ने मुझे गेट तक छोड़ कर मुझसे विदा लिया... 
मेरे भीतर तरह-तरह के भाव उमड़ रहे थे, जो मैं अपने शब्दों के माध्यम से कहना चाहूं भी तो नाइंसाफी होगी, परंतु अब नवोदय मेरे लिए विरान नहीं था, अब यह मेरा परिवार बन चुका था.. 
दोपहर का समय था इसलिए मैदान पर ज्यादा लोग नहीं थे, मैं जल्दी-जल्दी हाउस की ओर बढ़ने लगा, की अचानक एक आवाज ने मुझे रोका....

मैं अपने हाउस की ओर तेजी से बढ़ रहा था कि सहसा एक आवाज ने मुझे रोका... 
वह सुधा थी जो शायद अपने पेरेंट्स को छोड़कर मेरी तरह लौट रही थी...
पहले मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे मेरा नाम पता है, मैंने उससे जानना चाहा पर उसके पहले ही उसने जिक्र किया विज्ञान की कक्षा में मैडम बार-बार तुम्हारा नाम लेती है, इसलिए याद है... 
मुझे कुछ पल के लिए अपने आप पर गर्व महसूस होने लगा फिर मैंने उससे पूछा तुम्हारे भी मम्मी-पापा आए थे.... ?
उसने रुंआसे गले से जवाब दिया.... हाँ....., 
हम दोनों एक ही मनोदशा से गुजर रहे थे, अगले कुछ पल हम में से किसी ने कुछ नहीं कहा,
जब आप किसी के साथ हो और आपको एक दूसरे की चुप्पी नहीं खलती, आप वाकई एक अच्छे सहपाठी अथवा प्रेमी हैं....
वैसे तो मुख्य गेट से लेकर मेस तक की दूरी 5 मिनट की ही थी, पर एक दूसरे के साथ कुछ लम्हों को जीने के लिए हम दोनों ने अपनी गति धीमी कर ली थी,
मेरे अंदर की उदासी कुछ कम होने लगी...
परन्तु सुधा अभी भी अपने मम्मी-पापा को विदा करने के दुख से वियोग पीड़ा से गुजर रही थी...
आधी दूरी तय करने तक हमने कुछ एक बातें ही की थी, पर ऐसा महसूस नहीं हो रहा था कि हम एक दूसरे को बस उतना ही जानते हैं, जितना हमने अपने बारे में साझा किया था....
उसने अपनी बेडपार्टनर दीदी के बारे में बताया कि वह कितनी सपोर्टिंग नेचर की है, बातों के सिलसिले में हम मेस तक पहुंच गए....
मेस के ठीक पीछे गर्ल्स हॉस्टल था... हमारा सफर वहीं तक रहा पर मेरा मन चाहता था कि आज दुनिया भर की बातें उससे करता रहूँ.... 
चूँकि मेरा पेट पूरी तरह भरा हुआ था इसलिए मैं हाउस की ओर बढ़ गया.... मेरे मन में अभी भी सुधा के ही विचार आ रहे थे.... 
मन बहुत खुश था क्योंकि आज मुझे महसूस हो रहा था कि नवोदय ने मुझे अपना लिया... नवोदय ऐसी दुनिया है जहां मैंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण गुण सीखे... 
एक दूसरे को सपोर्ट करते हुए सीनियर से अपना बचाव करना, आत्म-विश्वास के साथ अपनी बात कह पाना, स्वावलंबन एवं स्वाध्याय के महत्व को समझना... 
शिक्षकों से भी परिवार जैसा स्नेह मिल सकता है इस बात की अनुभूति नवोदय परिवार ने ही कराई... 
मैं भी उन सैकड़ों विद्यार्थियों में से एक था जो अपने परिवार और गांव को छोड़कर बेहतर शिक्षा के लक्ष्य से इस परिवार से जुड़ा था... 
नवोदय परिवार ही ऐसा है जो हर किसी को अपना बना लेता है, जीवन के मँझधार में नवोदय एक पतवार बनकर आया जो मुझे आज भी जिंदगी के थपेड़ो से सुरक्षित रखता है....
नवोदय में अच्छे व बुरे दोनों अनुभव हुए परंतु अच्छे-बुरे से ऊपर उठकर समता का भाव रखने का पाठ भी नवोदय ने ही सिखाया.... 
कहने को तो बहुत कुछ है परंतु विराम-चिन्ह भी आवश्यक है, नवोदय ने जो कुछ भी दिया, 
उसके भावों को शब्दों में पिरोने कि मेरी क्या ही बिसात फिर भी एक प्रयास कर रहा हूं आप सभी का स्नेह अपेक्षित है.....

था एक बचपन का वो दौर, जहाँ वक्त रहते वह सम्भल गया। 
है वो एक खास जगह, जहाँ तकदीर उसका बदल गया।। 

जेल समझता था उस जगह को, यह बात बड़ी पुरानी है। 
ग्यारह साल का वो डरपोक सा लड़का, जिसके जन्नत की यह कहानी है।। 

आजादी को दाव लगाकर, बड़ों के कहने पर मजबूर हुआ।। 
कैद होकर उन चार दीवारों मे, अपने घरवालों से दूर हुआ।। 

मासूम सी तो सोच थी उसकी, अकेले सोने से डरता था।। 
जब मम्मी पापा की याद आती, चुपचाप रो लिया करता था।। 

नज़रिया बदलकर भूला वो सब कुछ, जो दु:ख उसके दिल मे समाये थे। 
जब मिलने लगा उन सभी अनजानों से, जो उसके जैसे ही वहाँ आये थे।। 

उन अजनबियों के साथ रहते रहते, वक्त न जाने कैसे कटने लगा। 
उन चार दिवारों मे भी उसको, अपनापन जैसा लगने लगा।। 

वहाँ पर रहकर सारे बच्चे, इंसानियत की पाठ सीख जातें हैं। 
वहाँ तो अलग-अलग जाति के लोग भी, एक ही थाली मे खाना खाते हैं।। 

वहाँ उसने बहुत कुछ सीखा जो उसकी जिदंगी मे काम आऐ ।
वहाँ के सारे अजनबी ही आगे जाकर, उसके अपने दोस्त कहलाये।। 

फिर आयी वहाँ से जाने की बारी, जहाँ पहले रहने को वो मजबूर था। 
जाते वक्त आँखों में आँसु नहीं थे, पर दिल मे दर्द जरूर था।। 

अब उसकी जिदंगी आजाद है, वो अपनी कहानी सभी को सुनाता है।
क्योंकि उन चार दिवारों मे बीता दिन, उस लड़के को आज भी याद आता है।।

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