"नवोदय का पहला दिन"
"तुम पास हो गए" की एक उतावली एव उत्साह से भरी हुई आवाज के साथ घर की देहरी को पार करते हुए चाचा जी ने जैसे ही यह बात कही, मेरा मन उत्साह से हिलोरे लेने लगा। वैसे अपने द्वारा की गई मेहनत और लगन पर मुझे पुरा भरोसा था परंतु हुबहू वैसा ही परिणाम पाकर मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा था। कुछ ही पलों में यह समाचार मेरे मित्रों के माध्यम से पूरे गांव में फैल गया। जितना मैं खुश था उतना तो शायद जंग जीतकर लौटा हुआ फौजी भी ना होता होगा, परंतु मेरी खुशी में मेरी मेहनत साफ झलक रही थी । शाम होने को आयी , घर वालों ने यह पूछना भी शुरू कर दिया - बताओ आज क्या खाना चाहते हो ? उस रात खीर, पूड़ी के साथ मनपसंद सब्जी का स्वाद चखा परंतु मेरे पास होने की खुशी से वह भी कम था।
अगले दिन सुबह उत्साह अपने चरम पर था, मैं चाचा जी के पास पहुंच कर विद्यालय की औपचारिकताओं को पूरा करने के बारे में बात करने लगा। धीरे-धीरे करके सारी औपचारिकताएं पूर्ण हो गई ।
अब विद्यालय में प्रवेश लेने का समय आ गया, तदोपरांत चटाई, बक्सा, बाल्टी और मग्गे का भी इंतजाम हो गया।
वाकया है 8 जुलाई 2009 का जब मुझे नवोदय विद्यालय में प्रवेश लेने जाना था, उस दिन मैं सवेरे जल्दी उठकर पापा के साथ तैयार होकर बिलासपुर जाने के लिए बस का इंतेज़ार करने लगा , न जाने क्यों उस दिन मुझे अपने गाँव की मिट्टी से एक अलग ही लगाव और प्यार महसूस हो रहा था ।
वैसे तो मेरा दिल नवोदय के दर्शन के लिए उतावला था, पर मैं अपने गांव से जुदा होने के दुःख और अपने दोस्तों से दूर जाने की बात से हतोत्साहित भी था ।
मेरा गाँव मेरे जिले के नवोदय विद्यालय से करीबन 90 कि. मी की दूरी पर स्थित है ।।
बस की यात्रा 3 से 4 घण्टे की थी तो मुझे भी सोचने के लिए ख़ूब वक़्त मिल गया ।
कभी मन में आता की नवोदय विद्यालय भी हैरी पोर्टर के हॉगवर्ट्स की तरह शानदार होगा और मुझे भी अपनी हरमोइनी (हैरी पॉर्टर सिरीज़ की अभिनेत्री) मिलेगी,
तो कभी मन में नए जगह का भय भी होता था ।
किसी प्रकार सोच में डूबे हुए अपनी यात्रा पूरी करने के बाद हम विद्यालय पहुंचे ।
विद्यालय का भव्य द्वार देखकर मेरे मन मे लड्डू फूटने लगे ।
अंदर प्रवेश करने पर अशोक वृक्ष की ताजी हवा ने हमारा स्वागत अपनी बाहें फैलाकर इस प्रकार किया मानो वो मुझे अपने आलिंगन में समेट लेना चाहती हैं। वातावरण बाहर जितना शान्तनुमा था, मेरे भीतर उतना ही अधिक उफान भर रहा था ।
कुछ ही दूर चलने पर सामने एक बोर्ड लगा हुआ दिखाई पड़ा जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित था ।
"खेलो इतना खेलो की खेल पढ़ाई बन जाए
पढ़ो इतना पढ़ो की पढ़ाई खेल बन जाए"
आगे बढ़ने पर हम अकादमी बिल्डिंग के प्रवेश द्वार पर थे। वहीं पर मैंने सबसे पहले गौतम बुद्ध की प्रतिमा के दर्शन किए, जो हमारे कला अध्यापक के द्वारा निर्मित थी ।
"बुद्धम शरणम गच्छामि" सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ था, जो अब तक मैंने नैतिक शास्त्र की किताबों में ही पढ़ा था ।
ऑफिस के औपचारिक कार्य हो जाने के बाद हम प्राचार्य कक्ष पहुंचे, जहाँ पर बी.के.मोहंती जी(प्राचार्य) द्वारा विद्यार्थियों का एक प्रकार का साक्षात्कार लिया जा रहा था।
यह साक्षात्कार हमारे नवोदय के प्रति प्रतिबद्धता को जाँचने के संबंध में था।
सवाल बड़े अनूठे थे।
करेले की सब्जी मिलेगी तो खाना खाओगे ?
मम्मी पापा की याद में रोओगे तो नहीं ?
और कुछ हास्य की बातें भी हुई,
पर मैं अब भी थोड़ा सहमा हुआ-सा था।
बाहर निकलने पर प्रवेश के लिए आए हुए सहपाठियों को देखकर मन और भी बेचैन होने लगा।
मेरी पहचान का वहां कोई भी नहीं था।
मेरा मन कुछ डरने सा लगा था,
कुछ देर के बाद शिवालिक हाउस (नवोदय विद्यालय में विद्यार्थियों के हॉस्टल के नामों में से एक)
के कैप्टन गोपाल भैया मिले और हमें हाउस लेकर गए। उनके अपनेपन भरे शब्दों से मुझे थोड़ी राहत मिली परन्तु मैं अब भी निराशा की स्थिति से पूरी तरह नहीं निकल पाया था।
गाँव से मीलों दूर एक नई दुनिया में मैने अपने कदम रखे थे और आने वाला कल क्या दिखलाएगा इसकी भी मुझे कोई खबर नहीं थी ।
परन्तु मैं रोना नहीं चाहता था , क्योंकि यह नई दुनिया मुझे बहुत कुछ सिखाने वाली थी।
हॉस्टल पहुंचकर अपना सामान व्यवस्थित कर हम खाना खाने के लिए भोजनालय की ओर चलने लगे, तभी मैने देखा कि कुछ विद्यार्थी अपनी उंगलियों पर थालियों को घुमाते हुए जा रहे थे।
भोजनालय पहुंचकर मैंने अपने लिए थाली लिया और खाने के लिए डाइनिंग टेबल पर बैठ गया,
खाने में राजमा-चावल था, जो मेरे लिए एक नया व्यंजन
था, एक ही दिन में इतना कुछ नया अनुभव करना रोमांचित करने के साथ-साथ एक डर भी पैदा करता है।
खाना हो जाने के बाद जब हम वापस हॉस्टल पहुँचे तो मुझे अपने बेड पार्टनर की गुण-गाथा कप्तान भाई जी द्वारा विस्तार से जानने को मिली की मेरे बेड पार्टनर कितने शालीन, संयमवान, गाँधीवादी और विद्वान हैं।
इतनी तारीफ सुनने के बाद मेरा मन भी उतावला हो उठा उनके दर्शन के लिए।
करीबन 20 मिनट बाद विवेक मार्को भैया हाउस आए, उनका स्वभाव और हंसमुख चेहरा देखकर लगा की नवोदय की इस दुनिया में मुझे एक सहपाठी मिल गया।
नवोदय में बेड पार्टनर के क्या संबंध होते हैं यह सिर्फ नवोदय विद्यालय का एक विद्यार्थी ही समझ सकता है।
इस रिश्ते को शब्दों में बयां करना कदाचित मुश्किल है। एक नवोदयन का अपने पहले बेड पार्टनर से एक अलग ही जुड़ाव होता है।
इसी प्रकार मेरा भी था,
विवेक भैया अपने नाम की ही तरह विवेकशील मालूम होते थे, पापा और उनकी बातचीत हुई जिसमें पापा द्वारा मेरा ख्याल रखने का जिम्मा मार्को भैया को सौंपा गया।
अब पापा के वापस लौटने का समय हो गया,
मेरे साथ हाउस कप्तान गोपाल भैया और मार्को भैया भी थे। मैं उस समय भी रोना चाहता था मगर तब तक मेरा मन अपने आप को संभाल चुका था।
आज सहपाठी के रूप में गोपाल और मार्को भैया भी मिल चुके थे, पापा के जाने के बाद मन थोड़ा भारी हो गया था, अब तक मैं नए जगह को लेकर कुछ उत्साहित था पर अब अंतर्मन की वेदना की वजह से वह उत्साह धूमिल हो रहा था।
प्रवेश द्वार के भीतर आने पर मुझे एक बांसुरी वाले की मधुर तान सुनाई दी। वह भी उसी चौपाल पर बैठा था, जहां मैं कुछ समय पहले पापा के साथ बैठा हुआ था। उसकी मधुर तान सुनकर किसी के भी चेहरे पर मुस्कान आ सकती थी।
पर मुझे वह मधुर और सुरीला साज अपने परिवार की विरह पीड़ा को बयां करता महसूस हो रहा था।
मैं खुलकर रो लेना चाहता था, पर मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं रो क्यों नहीं पा रहा था,
शायद इसलिए कि मुझे दुलारने के लिए मेरी मां वहां पर नहीं थी,
हम सभी को एक न एक दिन अपने घर वालों से दूर अच्छी शिक्षा की प्राप्ति के उद्देश्य से जाना ही पड़ता है। एक नवोदयन के जीवन में यह दीक्षा-संस्कार बाल-अवस्था में ही हो जाता है,
जिस उम्र में बच्चे पोगो और कार्टून नेटवर्क देखते हैं उस उम्र में एक नवोदयन जिंदगी के फलसफे सीखता है।
नवोदय की दुनिया अपने आप में अनूठी है जिस प्रकार होगवार्ट्स (हैरी पॉटर का जादुई स्कूल) पहुंचने के लिए आपका जादुई कला में प्रतिभावान होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी भी प्रतिभाओं से परिपूर्ण होते हैं। हर कोई अपने आप में खास होता है और अपने पिछले विद्यालय का एक उत्कृष्ट विद्यार्थी होता है।
उसे JNVST की परीक्षा में उसी प्रकार "परीक्षित" होना पड़ता है, जिस प्रकार हैरी पोर्टर में हॉग्वार्टज़ जाने के लिए प्लेटफॉर्म नम्बर 9'3/4 (हॉग्वार्टज़ का प्रवेश द्वार) में निडर होकर कदम रखना होता है।
लिहाजा नवोदय में जादू की शिक्षा से भी महत्वपूर्ण जिंदगी जीने की शिक्षा दी जाती है।
मैंने वापस अपने हाउस पहुंचकर कुछ देर आराम किया ही था कि "रिमेडियल" नामक एक नया शब्द मेरे शब्दकोश में जुड़ा,
मैं मार्को भैया के साथ अकादमीक कक्ष की ओर चल पड़ा, रास्ते में रंग-बिरंगे टी-शर्ट पहने विद्यार्थियों को देख कर मन में उत्सुकता हुई, पर शायद मेरे मन की बात मार्को भैया ने भांप ली और बताया कि यह हाउस ड्रेस है।
अरावली-नीला, नीलगिरी-हरा, शिवालिक-लाल & उदयगिरि-पिला,
शायद तब से ही मेरा पसंदीदा रंग लाल है चूँकि मैं शिवालिक हाउस से था।
अकादमीक कक्ष में प्रवेश करते हुए वहां पर लिखा एक वाक्यांश पढ़ा ;
"Come In To Learn,
Go Out To Serve"
इस वाक्यांश के मायने समझने के कमोबेश में, मैं किसी तरह अपनी कक्षा पहुंचा।
कक्षा दो भागों में विभाजित था,
मैं "ए" सेक्शन की एक बेंच पर जाकर बैठ गया।
अभी मैं उस वाक्यांश ;
"Come In To Learn,
Go Out To Serve"
को समझने की कोशिश ही कर रहा था, कि सहसा मेरी नजर मेरी कक्षा की एक लड़की पर पड़ी,
उसने चटक लाल रंग का एक सलवार-शूट पहन रखा था।
मेरा मन परिवार के वियोग से निकलकर, प्रेम के सागर में गोते लगाने लगा, यह निश्छल प्रेम था।
"एक प्रेमी को सर्वाधिक प्रेम करना चाहिए,
अपनी प्रथम प्रेम की निश्छलता से।"
(कहीं पढ़ा था)
मेरे अंदर किसी भी प्रकार की आकांक्षा जागृत नहीं हुई, बस मैं प्रेम को महसूस कर रहा था।
प्रेम जो भक्ति की सर्वोच्च शाखा है,
उनकी मुस्कान बहुत प्यारी थी और उनका स्वभाव भी बेहद सरल था उनका नाम था....
"दुनिया में सबसे आसान है प्रेम करना, इससे आसान भला क्या होगा।
प्रेम एक ऐसी चीज़ है जो बस हो जाती है।
ना तो उसे करने से पहले सोचना पड़ता है ना ही करने के बाद।
प्रेम में बुद्धि का कहीं कोई स्थान नहीं होता।
प्रेम के होने को बस महसूस किया जा सकता है।
उसके होने की कोई प्रक्रिया नहीं होती।
जैसे पलकों का झपकना, अचानक से ज़ोर की छींक का आ जाना।
आपके पास सोचने का समय नहीं होता और प्रक्रिया पूरी भी ही जाती है।
इसी प्रकार प्रेम है।
ये आपको सोचने का समय नहीं देता।
आपने बगीचे में गुलाब का फूल देखा तो आप उससे प्रेम करने से पहले सोचते नहीं है।
वो खुद व खुद आपको अपनी तरफ खींच लेता है।
उसी प्रकार प्रेम आपको आकर्षित करता है।"❤️
मेरे अंदर का दार्शनिक उसे देखकर जागृत हो गया था, मैं उसकी मुस्कान पर लप्रेक लिख सकता था,
उसकी खूबसूरती पर कविताएं लिखी जा सकती थी, उसकी जुल्फों पर गजल और शायरी का मिलन हो सकता था,
यदि उस समय लाइब्रेरी मैडम कक्षा में नहीं आती, कक्षा में आकर मैडम ने हम सभी विद्यार्थियों को संबोधित किया, कक्षा के सभी बच्चे उनको ध्यान से सुन रहे थे, सभी के चेहरे पर उत्सुकता झलक रही थी ।
सभी के लिए यह अनुभव नया था, मेरे लिए तो बेंच पर बैठना भी एक अनूठा अनुभव था क्योंकि गांव में अपने विद्यालय में मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा टाट पट्टी पर बैठकर ही ग्रहण की थी ।
लिहाजा हम सभी विद्यार्थी इस नएपन के उमंग में और अपने परिवार से वियोग की पीड़ा के बीच कश्मकश से गुजर रहे थे,
अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्र से होने की वजह से हमारी कक्षा के बहुतायत विद्यार्थी हिंदी माध्यम से थे, इसलिए हमारे लिए पाठ्यपुस्तक की व्यवस्था भी हिंदी माध्यम में की गई थी ।
मैं अभी भी उसकी मुस्कान निहार रहा था, पता ही नहीं चला और रिमेडियल की छुट्टी हो गई,
मैं अब तक उनका नाम भी नहीं जान पाया था।
रिमेडियल के उपरांत हाउस जाकर मैंने किताबों के सिलसिले में मार्को भैया से बातचीत की, और अपनी कक्षा के कुछ विद्यार्थियों से परिचय भी हुआ ।
मैं अभी यह पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पा रहा था की मैं अपने परिवार से दूर एक अलग ही दुनिया में हूँ,
शाम होते ही मुझे अपने घर की चाय की प्याली याद आने लगी ।
मैं मन-मसोस कर रह गया, चाय से मेरा नाता अटूट है ;
"जितनी कड़क होगी उतनी ही लजीज होगी,
चाय भी कुछ जिंदगी सी है"
हाउस से निकलकर मेरे कदम खेल के मैदान की ओर बढ़े, ऐसे खेल जिनका मैंने केवल नाम सुना था आज अपनी आंखों के सामने देखना भी एक अनूठा अनुभव था,
हॉकी, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल.....
सहसा मुझे अपना पसंदीदा खेल दिखाई दिया... शतरंज...😊
मैं वहाँ पर बैठकर उत्सुकता से देखने लगा, शायद कुछ सीनियर खेल रहे थे.. मैं इस खेल की बिसात समझने में पिछले दो साल का अनुभवी था,
मैंने एक पक्ष की मदद की और वह जीत गया,
हारने वाला पक्ष मुझसे कुछ नाराज़ भी हुआ,
वापस लौट कर मैं तैयार हुआ और सुपरविज़न के लिए एक सहपाठी के साथ अकादमीक कक्ष की ओर चल पड़ा,
सुपरविजन का तात्पर्य स्वाध्याय होता है,
जो मुझे आने वाले समय में ज्ञात हुआ, स्वाध्याय के पूर्व 6:00 बजे संध्या प्रार्थना के लिए सभी mp hall में इकट्ठा हुए,
उस दिन संध्या प्रार्थना मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे और पहले अनुभवों में से एक था,
"हे शारदे मां" का गान सभी विद्यार्थियों द्वारा मिलकर किया गया,
पहली बार मैंने इस प्रकार के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट देखे, जैसे कॉंगो, क़ेसिओ....
पार्थना के बाद हम अपनी कक्षा पहुंचे, मेरी निगाहें उस मंद मुस्कान की तलाश करने लगीं,
कुछ समय दोस्तों से परिचय का सिलसिला चला,
उसके बाद हमें ग्रन्थालय जाने का आमंत्रण मिला,
हम सभी विद्यार्थी ग्रन्थालय में कतार लगाकर अपनी बारी का बेसब्री से इंतजार करने लगे, पर मेरी निगाहें उस भोली मुस्कान की तलबगार होने लगी,
कुछ दोस्त पुरानी किताबें मिलने की वजह से निराश थे परन्तु मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, क्योंकि किताबें मुफ्त मिल रही हैं,
सहसा लड़कियों की कतार से बुलाने के लिए मैडम ने एक नाम पुकारा ; ******
भीड़ की आवाज़ में उसका नाम धूमिल हो गया औऱ मैं उनका नाम जानने से रह गया ।
मेरी नजरें उस ओर ही ठहर गई, यह वही थी जिसका जिक्र मैंने अब तक हरमोइनी के रूप में किया,
वह भी किताबें पाकर बेहद खुश थी, वापस कक्षा में आकर सभी ने अपने किताबों पर अपने हस्ताक्षर अंकित किए ।
मुझे अपने नाम को लेकर बचपन से ही एक प्रकार का गर्व था, मैं अपनी बेकार हैंडराइटिंग से अपना नाम लिखकर अपने अभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था,
इसलिए मैंने अपने किताबों पर अपना नाम उस समय नहीं लिखा, पर मेरी नजरें अपना नाम अंकित करती हुई इस कहानी की अभिनेत्री की ओर बढ़ी और मैं उसकी लिखावट के अंदाज से उसका नाम जानने की कोशिश करने लगा, पर मेरी कुशाग्र बुद्धि ने मेरा साथ नहीं दिया मैं अपनी कक्षा में अपने क्षेत्र से आए सहपाठी की तलाश करने लगा नवोदय में एक बात पक्की होती है कि यदि कोई सहपाठी अथवा सीनियर आपके गांव अथवा क्षेत्र से है तो उनसे आपकी प्रगाढ़ मित्रता निश्चित है,
लिहाजा रात्रि के 8:00 बजते ही घंटी बजी, सभी हाउस जाने की होड़ में किताबें समेटने लगे, शोरगुल होने लगा पर हरमोईनी बहुत ही शालीनता से कक्षा से बाहर निकली, मन में आया कि जाकर उनका नाम पूछ लूँ पर हिम्मत नहीं जुटा पाया ।
रात्रि भोज के लिए मैं अपने एक सहपाठी के साथ डाइनिंग हॉल पहुंचा,
खाने का स्तर देखकर सहसा ही मां की याद आ गई, और मेरा दिल अंदर ही अंदर विलाप करने लगा ।
अपनी थाली लेकर मैं टेबल पर बैठा ही था की अचानक मुझे एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी,
मैं पीछे मुड़ा और देखा की आराधना दीदी खड़ी थीं जो मेरे गांव के समीप रहती थीं,
और नवोदय आने से पहले उनसे मेरी मुलाकात हो चुकी थी, उन्हें देखकर मेरे हृदय की वेदना कुछ कम हुई ऐसा लगा कि नवोदय की इस वीरान दुनिया में मेरा मार्गदर्शन करने और ध्यान रखने वाला कोई मिल गया । नवोदय प्रवेश से पहले उनसे मेरी मुलाकात सिर्फ़ एक ही बार हुई थी,
परंतु उन्हें देखकर जो अपनापन महसूस हुआ उसे शब्दों में पिरो देना उस स्नेह की भावना का अपमान होगा।
मेरे मन का संबल धीरे-धीरे प्रबल होता जा रहा था, क्योंकि दिन की शुरुआत से लेकर अब तक मुझे कुछ लोग ऐसे मिल चुके थे जो मुझे अकेले होने का आभास नहीं होने देते ।
दीदी से मिलना अपने गांव की मिट्टी का स्पर्श पा लेने जैसा महसूस हुआ, और मेरे दिन भर की थकान भी कुछ देर क़े लिए दूर हो गई ।
दीदी कक्षा 11वीं में थी इसलिए मैं अपने आप को उनके सानिध्य में सुरक्षित महसूस कर रहा था ।
उनसे थोड़ी देर बातचीत हुई और उसके बाद उन्होंने मेरा परिचय अपने सहपाठियों से कराया,
जिससे मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई ।
मैं अपने टेबल की ओर लौट ही रहा था कि अचानक एक नाम की मेरे कानों में आवाज गूंजी,
मैंने देखा कि गर्ल्स हाउस की हाउस मिस्ट्रेस नए प्रवेश लिए बच्चों का अटेंडेंस ले रही थी....
उन्होंने पुकारा ; "सुधा रतावल"...
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...
यह वही थी जिसके मंद मुस्कान पर मैं मोहित था, इस कहानी की अभिनेत्री हरमोइनी...
मैं कुछ पल के लिए वहीं पर स्तब्ध खड़ा रहा, फिर खाने के टेबल की ओर बढ़ गया, टेबल पर पहुंचा तो देखा कि एक सहपाठी ने मेरे लिए भी खाना निकाल दिया है,
यह देखकर मुझे नवोदय की इस वीरान दुनिया से प्रेम होने लगा था ।
सभी सहपाठियों भैया एवं दीदी द्वारा मैत्रीपूर्ण और स्नेहिल व्यवहार से मैं बहुत खुश था,
मेरी जिंदगी में एक नया फ़लसफ़ा जुड़ा,
ख़ुश रहने के लिए सिर्फ़ साधनों की जरूरत नहीं है,
चंद अच्छे दोस्त भी ख़ुशनुमा जिंदगी जीने के लिए जरूरी हैं....
खाना पूरा होने के बाद मैं हाउस वापस आ गया ।
वैसे मैं अपने हाउस का नाम भी ठीक तरह से याद नहीं कर पाया था.. दीदी के पूछने पर भी मैं "शिव" "शिवलिंग" "शिवाय" बोलता रह गया था,
लिहाजा उन्होंने समझ लिया था,
हाउस वापस आने पर मार्को भैया ने मुझे बताया, की थोड़ी ही देर में हमारे हाउस मास्टर आएंगे,
मुझे इस शब्द का आशय तो मालूम नहीं था, पर इतना जरूर समझ पाया की कोई अध्यापक आने वाले हैं, थोड़ी ही देर में हमारे हाउस मास्टर पधारे ।
हमारे हाउस मास्टर काफी वरिष्ठ शिक्षक थे, अटेंडेंस लेने के बाद उन्होंने नवागंतुक छात्रों से बातचीत की... उनका बातचीत करने का रवैया अपनापन भरा था,
हम सभी के जीवन में अध्यापक एक एक विशेष महत्त्व होता है, शायद इसलिए अध्यापक को भगवान का दर्जा भी दिया गया है..
मेरे लिए हमारे हाउस मास्टर भी कुछ ऐसा ही महत्व रखते थे, उनके अनुभवों को सुनना मोटी किताबों को पढ़ने से बेहतर था,
बहरहाल उस दिन ज्यादा बातचीत नहीं हुई ,
वे हाउस का मुआयना करके वापस चले गए...
बिस्तर पर लेटते ही मन में तरह-तरह के विचार आने लगे....
जैसे यदि मेरे पास हैरी पोर्टर की छड़ी होती, तो मैं छड़ी घूमा कर "वैनगाडियम लेवियोसा" जैसा कोई मंत्र बोलकर या सोनपरी की तरह "इत्तु बीतु झिम पतुता" बोलकर घर चला जाता....
मुझे मालूम है यह सारी बातें आपको हास्यास्पद लग रही हैं परंतु एक 10 साल क़े बच्चे से अब आप कितनी समझदारी की उम्मीद करेंगे,
अपने पुराने स्कूल के दोस्तों की याद भी आने लगी...
कुछ पंक्तियां उनकी याद में ;
"पुराने दोस्तो की भीड़ ना जाने,
कहाँ गुम हो गई...
अरे अभी तो सब यहीं थे ....
लगता है शायद स्कूल की छुट्टी हो गई....
मेरे साथ लुका-छिपी खेल रहे हो क्या...
या फिर ये कोई मज़ाक है...
वापस तो आओ य़ारों,
अभी बाकी बहुत हिसाब है..."
खाने के बाद भी मेरा पेट नहीं भरा था, क्योंकि मैंने उस स्तर का खाना पहले कभी नहीं खाया था, फिर भी मैं किसी से इस बारे में कहने में संकोच कर रहा था,
मेरे alternate अपोजिट बेड पर आशीष कश्यप भैया रहते थे, शायद उन्हें मेरा मुरझाया चेहरा देखकर इस बात का अंदाज़ा हो गया, और उन्होंने अपने बक्से से निकाल कर मुझे बिस्किट ऑफर किया ।
एक नवोदयन का बक्सा उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं होता, और उसमें रखे तरह-तरह के व्यंजन उसके लिए हीरे-मोती के समान होते हैं,
अली बाबा की गुफा की तरह इसे खोलने के लिए भी "खुल-जा-सिम-सिम" जैसा मंत्र चाहिए होता है ।
बक्से के मालिक को मक्खन लगाना इसके लिए अचूक राम-बाण है ।
परन्तु मुझे यह सब नहीं करना पड़ा था, बिस्किट खाते हुए मेरी उनसे कुछ बातें हुई, जिसमें अगले दिन में क्या-क्या होने वाला है, इसका ब्यौरा उन्होंने दिया,
शक्तिमान सीरियल की कुछ बातें भी हमनें की,
मैंने उन्हें बताया कि गीता विश्वास को पता चल गया है कि गंगाधर ही "शक्तिमान" है ।
बातों के सिलसिले में मुझे एक बार फिर अपने घर की याद आ गई, मेरी स्थिति उस समय कुछ ऐसी थी जो शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है,
पर मेरी यह कविता आपको मेरी स्थिति का आभास करा सकती है ;
चाहता हूँ बहुत कुछ कहना , पर शब्दों की कमी है !
दिल परेशां है , आँखों में कुछ नमी है !
ना जाने क्यों शब्द डगमगा रहे है ,
ना जाने क्यों जुबां लड़खडा रही है ,
ना जाने कैसा तूफान है , बस खामोशी छा रही है !
चाहता हूँ खामोश रहना , नब्ज़ कुछ अनमनी है !
दिल परेशां है , आँखों में कुछ नमी है !
इस प्रकार नवोदय में मेरा पहला दिन बीता, उम्मीद करता हूँ आपका भी कुछ ऐसा ही रहा होगा । आप सभी के स्नेहाशीष के लिए हृदय से आभार,
एवं इस संस्मरण को ढेर सारा प्यार देने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया..😊
©परीक्षित जायसवाल