Saturday, September 5, 2020

शिक्षक और विद्यार्थी

"एक अच्छे शिक्षक का दावा"

सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ ।
नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ ।
चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी,
तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ।
समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के,
और मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ।
बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा,
अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ।

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"अच्छे शिक्षक से एक स्टूडेंट का निवेदन"

मुझे अल्हड़ता से गाने दो, 
क्यों अपना साज बनाते हो?
मैं पिय का प्रेम पपीहा हूँ, 
मुझको क्यों बाज़ बनाते हो?

कुदरत ने कंठ दिये मुझको,
अपने ही सुर में गाने को,
तुम मेरे गीत बदलकर क्यों
अपनी आवाज बनाते हो?

मैं ना मिट्टी का लौंधा हूँ 
और ना ही कोई पत्थर हूँ,
मैं तो आज़ाद परिन्दा हूँ, 
मुझको क्यों ताज़ बनाते हो?


Friday, August 28, 2020

"एक अच्छे शिक्षक का दावा"

"एक अच्छे शिक्षक का दावा"


सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ ।

नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ ।

चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी,

तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ।

समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के,

और मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ।

बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा,

अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ।


--------------------------------------------------


"अच्छे शिक्षक से एक स्टूडेंट का निवेदन"


मुझे अल्हड़ता से गाने दो, 

क्यों अपना साज बनाते हो?

मैं पिय का प्रेम पपीहा हूँ, 

मुझको क्यों बाज़ बनाते हो?


कुदरत ने कंठ दिये मुझको,

अपने ही सुर में गाने को,

तुम मेरे गीत बदलकर क्यों

अपनी आवाज बनाते हो?


मैं ना मिट्टी का लौंधा हूँ 

और ना ही कोई पत्थर हूँ,

मैं तो आज़ाद परिन्दा हूँ, 

मुझको क्यों ताज़ बनाते हो?


©परीक्षित

बिलासपुर छत्तीसगढ़

Thursday, August 27, 2020

Just_be_in_the_present

#Just_be_in_the_present
(Trying to....)

Yes , it's important to tell my heart
Since I started Thinking

Yes the time begins
& I'm the beginner

Just trying to....
Create myself encompassing
Practice with patience

Integrate myself comprising
Passion and persistence

Glowing up the mind with
Dedication nd Determination

Formulating my habit considering
Discipline nd devotion

Regulate the soul nd mind
With dare and distinction

Maintaining the strategies
With Speed and Accuracy

Yes ....All humans are the beginners
All are students
All are son of God
Who teach us every second of life

The only thing is to
Observe nd accept the truth
i.e. Learning

Remember
Integrity is everything.....

And we must integrate ourself
By putting the limits
From *zero to unity*
The perfection is the variable
Depends upon our work

And Practice is the integrating factor
This will results a better answer
Of life......

Tuesday, August 25, 2020

कुछ पुरानी यादें

कुछ पुरानी य़ादे :-

वो पुरानी कॉपी....
सहेजे हुए है ना जाने राज़ कितने....
आखिरी पन्नो पर लिखे हुए कुछ नाम...
जिनका आज जीवन से कुछ वास्ता नही....,
सबकी अलग मंजिल अब एक रास्ता नही ...
वो कुछ पुराने खेल..... गाने की पंक्ती ...
जीवन तो उस कॉपी मे था अब अलग है ज़िन्दगी....

वो पुरानी किताब.... जिसमे आज भी रखा है गुलाब का वो सूखा हुआ फूल....
ये फूल भी अपनी एक अलग कहानी कहता है...
उडे हुए रंग....,सूखी बिखरी पंखुडियो की जुबानी कहता है....
ये आज भी बताता है कि मुझे इससे कितना प्यार था...
ये किसी की निशानी नही...बचपन से मेरी खुशियो का राजदार था....

वो छोटी सी गुडिया ....
शायद आज भी मेरा इंतजार करती होगी....
बहुत समय से उसे नए कपडे नहीं पहनाये....
उसका जन्मदिन नही मनाया ....
अब तो ना जाने घर के किस कोने मे पड़ी मेरी रह तकती होगी...
रोते हुए भी उसे देखकर मैं मुस्कुरा देता था....
उससे कितनी बाते किया करता था....
पता ही ना चला वो कब मुझसे अलग हो गई...
वो तो आज भी वैसी ही है ...शायद मैं ही बड़ा हो गया..

पुराने दोस्तो की भीड ना जाने कहाँ गुम हो गई...
अरे अभी तो सब यही थे ....लगता है शायद स्कूल की छुट्टी हो गई....
मेरे साथ लुका छिपी खेल रहे हो क्या... या फिर ये कोई मज़ाक है...
वापस तो आओ य़ारो अभी बाकी बहुत हिसाब है...

जानता हूँ ये य़ादे वापस नही आयेंगी....
पर कोई बात नहीं...इन य़ादो को याद करने का भी एक अलग ही मज़ा है...
पर इन य़ादो मे अपना समय नही गवाँउगा ...
लेकिन तुम लोगो को भी याद जरूर दिलाऊगा....
अभी तो बहुत ज़िन्दगी बाकी है... चलो और य़ादे बनाते हैं...
आगे की ज़िन्दगी के लिए थोडी और शैतानियाँ सजाते है ...

"लफ़्ज़ों के मोती"

~परीक्षित जायसवाल

Sunday, August 23, 2020

नवोदय एक सफ़र

"नवोदय एक सफर" 

नवोदय विद्यालय में भी हॉग्वार्टज़ की तरह विद्यार्थियों को चार अलग-अलग हाउस में बांटा जाता है, 
गरुड़द्वार, नागशक्ति, मेहनतकश, चीलघात की तरह अरावली, शिवालिक, नीलगिरी एवं उदयगिरि ।
लिहाजा नवोदय में यह निर्णय बोलती टोपी नहीं करती,
पर एक बात जरूर है कि सभी हाउस की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं, जो उस हाउस में रहने वाले विद्यार्थी आदिकाल से उस परंपरागत विशेषता का कड़ाई से अनुपालन करते हैं ।
किसी हाउस में टॉपर्स, किसी में खिलाड़ी और किसी हाउस में आज्ञाकारी होने के लक्षण पाए जाते हैं ।
परन्तु एक हाउस ऐसा जरूर होता है, जो इन सभी शब्दों से ऊपर उठकर निर्वाण को पा चुका होता है ।

नवोदय में पहला दिन पूरा होने के उपरांत अगले दिन प्रातःकालीन प्रार्थना में हम सभी उपस्थित हुए,
प्रार्थना के उपरांत हमारा अभिवादन प्राचार्य महोदय ने डंबलडोर की भांति किया,
प्रातःकालीन प्रार्थना का हर एक नवोदयन के जीवन में विशिष्ट महत्व होता है, लिहाजा नवोदय में रहते हुए प्रार्थना के शब्दों के मूल भाव को हम पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाते,
परंतु आज यदि हम नवोदय प्रेयर के हर्फ़ों की ओर अपनी निगाहें दौड़ाए तो पाएंगे कि उन चंद शब्दों में कितना कुछ समाया हुआ है :-

"रंग जाति पद भेद रहित
हम सबका एक भगवान हो
संतान हैं धरती माँ की हम
धरती पूजा स्थान हो
धरती पूजा स्थान हो"

कुछ ही शब्दों में जिंदगी के नैतिक मूल्यों का परिचय कराने वाली प्रार्थना, आज के दौर में हमें समझने की अत्यधिक आवश्यकता है, जब हम जातिवाद के नाम पर आपस में लड़ रहे हैं ।

प्रार्थना पूरी होने पर प्लेज, न्यूज़, जी.के के साथ अन्य गतिविधियों का साक्षात्कार करना मेरे जैसे ग्रामीण परिवेश से आए विद्यार्थियों के लिए अनूठा अनुभव रहा..

प्रार्थना के उपरांत हमारा सेक्शन डिवाइड किया गया,
सभी को एक कतार में खड़ा कर "ए" और "बी" सेक्शन के लिए वर्गीकृत कर लिया गया,
मुझे "ए" सेक्शन मिला परंतु "सुधा रतावल" को "बी"सेक्शन,
कभी-कभी प्रेम अपने शुरुआती स्थिति में ही दम तोड़ देने जैसी परिस्थिति से गुजरता है, 
यह स्थिति मेरे लिए कुछ वैसी ही थी...
प्रार्थना के उपरांत कक्षा लौटने पर हमारा स्वागत थवाईत मैडम ने किया, जो विज्ञान की शिक्षिका थी...
थवाईत मैडम "नवोदय के सफर" में मेरी पसंदीदा शिक्षिकाओं में से एक थी, 
मुझे विज्ञान विषय में बेहद रुचि थी एवं मैडम का पढ़ाने का अंदाज भी निराला था ।
मुझे आज भी याद है कि मैंने अपने पहले यूनिट टेस्ट में विज्ञान विषय में पूरे अंक(40/40) अर्जित किए थे,
जी नहीं शो-ऑफ नहीं कर रहा हूँ, 
यह मेरी यादगार मेमोरी में से एक है, जो मैं अब तक नहीं भूल पाया हूँ । 
विज्ञान की कक्षा के अलावा अन्य विषयों की कक्षाएं भी प्रारंभ हो गई, 
मुझे आज भी हिंदी की वह पहली कक्षा याद है...
जब त्रिपाठी सर ने अपने अंदाज में कविता पाठ किया था ।
हिंदी भी मेरी पसंदीदा विषयों में से एक थी...

#मेरी_आपबीती 
पहले हमने क-ख-ग सीखा फिर बाद में पढ़ीं कविताएँ, कविताओं से तब से ही इश्क़ हैं हमें ।

अधिकांश कक्षा की शुरुआत में अध्यापक सभी विद्यार्थियों को अपना परिचय देने के लिए कहते..
जो मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होता था, 
अपनी बारी आने से पहले मैं मन ही मन दसों बार कुछ लाइंस रिपीट करता था
(my name is..... I am from.... I Scored.....)

मुझे लगता है की उस उम्र में यह सभी के लिए स्वभाविक होता है,
देखते ही देखते नवोदय विद्यालय में मेरा पहला सप्ताह बीतने लगा, मुझे आने वाले रविवार का बेसब्री से इंतजार था, क्योंकि मम्मी-पापा मुझसे मिलने आने वाले थे ।
इतना उतावला उनसे मिलने के लिए मैं पहले कभी नहीं हुआ था... 
ऐसा लग रहा था मानो मैं उनसे वर्षों के बाद मिलने वाला हूँ,
मेरे मन में उत्सुकता का सैलाब उमड़ रहा था, उनका स्वागत करने की तैयारी में मैंने अपने बिस्तर को सुव्यवस्थित कर लिया था, बेड के आसपास की सफाई भी कर ली थी ।
मेरा उमंग पल-पल बढ़ता जा रहा था,
मैंने अपने आपको इतना खुश पहले कभी नहीं पाया था..
मैं हाउस से निकल ही रहा था की सहसा एक आवाज़ आई परीक्षित...... 

मेरी निगाहें उस और गई तो पाया कि वहां पर आशीष भैया थे, 
उन्होंने मुझसे पूछा... बाहर जाएगा क्या..?
पहले मैं उनका आशय समझ नहीं पाया, फिर मालूम हुआ कि नवोदय विद्यालय के नियमों के अनुसार बाहर जाने के लिए आपको अपने सदन अध्यक्ष से अनुमति लेनी होती है,
मैंने हामी भर दी ।
उसके बाद हम नाश्ता करने के लिए साथ गए, नाश्ते में रविवार के अवसर पर पूड़ी एवं आलू की सब्जी होती थी, पूड़ी जैसे स्वादिष्ट व्यंजन के लिए लाइन की लंबाई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं, 
जो लंबी कतारें कोरोना संकट काल में मैखानों के खुलने पर लगी थी.. 
अपनी बारी का इंतजार मुझे बेसब्री से था,
परंतु कुछ सीनियर लाइन के बीच में घुसकर अनुशासनहीनता का परिचय देते हुए नज़र आए, उनका यह व्यवहार मुझे पसंद नहीं आया... 
अपनी बारी आने पर मैं नाश्ता लेकर भैया के साथ एक स्थान पर जाकर बैठ गया, भैया ने अपनी पूड़ियाँ मेरे प्लेट पर उड़ेल दी, मुझे कुछ समझ नहीं आया...
फिर उन्होंने मुझे उनका इंतजार करने के लिए कहा, 
थोड़ी ही देर में वो लौटे, उनके प्लेट में और पुड़ियां थी... 
उनसे यह राज जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि यह डबल मारने की कला है... 
जो सभी नवोदयन के लिए पूड़ी खाने की अपनी इच्छा तृप्ति को पूरा करने का जरिया होता है,
इसके लिए अथक परिश्रम और दृढ़ निश्चय की आवश्यकता होती है... 
जैसे दोबारा पूड़ी लेने से पहले थाली को अच्छे से धोना, या अपने बालों का अंदाज बदल लेना इत्यादि... 
मुझे एक फायदा जरूर हुआ कि मुझे पेट भर पूड़ी खाने को मिल गया... 
वापस हाउस लौट कर हम तैयार हुए और कुछ अन्य सहपाठी के साथ मिलकर अपने हाउस मास्टर के पास अनुमति लेने गए, 
अनुमति मिलने पर सबके चेहरे की मुस्कान देखने लायक थी, मुझे भी बाहर जाने की स्वच्छंदता की खुशी का एहसास धीरे-धीरे होने लगा..
नवोदय के गेट के बाहर कदम रखना एक अलग ही एहसास होता है, आप स्वच्छंद हो जाते हैं, बिल्कुल पंछियों की भांति...
बाहर भी ज्यादा दुकानें नहीं थी, पर जो स्वतंत्रता की खुशी थी, वह अन्य चीजों में मयस्सर कहां...
हम सभी ने अपनी जरूरतों की सामग्री के साथ-साथ खाने पीने की ढेर सारी चीजें ली... 
खिमेश भैया की दुकान नवोदय के गेट के ठीक सामने थी, हमारा अभिवादन उन्होंने ऐसी मुस्कान के साथ किया मानो उनकी दुकान चलने का पूरा जिम्मा हम नवोदयन के कंधों पर ही टिका हुआ है...
खरीदारी करने के बाद हम सभी "साहू होटल" जो वहां पर एकमात्र होटल था, की ओर बढ़े, मैं अपने साथ ज्यादा रुपए लेकर नहीं आया था, इसलिए मेरे पैसे किराना में ही खर्च हो गए थे....
परंतु होटल के लजीज समोसे देखकर मेरी जीवा में लालच आ गया...
हम सभी एक टेबल पर बैठ गए, मैं अभी भी इस बात पर पछतावा कर रहा था की मैं अधिक रुपए लेकर क्यों नहीं आया....
तभी भैया ने होटल वाले को आवाज लगाई और सभी के लिए समोसे लगाने को कहा.. 
मैंने उन्हें मना करने की कोशिश की पर वह नहीं माने, और कहा कि यहां के समोसे बेहद लजीज है...
मैं उन्हें अपनी तंग स्थिति से अवगत करा पाने में असमर्थ था, मैंने हामी भर दी...
नाश्ता करने के बाद बिल चुकाते समय उन्होंने मेरे कहे बगैर मेरी बिल का भुगतान कर दिया...
वैसे तो वह राशि बड़ी नहीं थी पर मेरे मन में नवोदय के सीनियर्स को लेकर स्नेह बढ़ गया.. 
हम सभी खुश थे अपनी इस आजादी पर, कुछ समय हमने टहलते हुए बिताया और फिर वहीं चौपाल पर बैठ गए... हमें वहां पर बैठे कुछ लम्हें बीते थे की वहां पर बांसुरी वाले भैया भी आकर बैठ गए... और बांसुरी बजाने लगे मुझे अपने पहले दिन की यादें एक बार फिर ताजा हो गई...
उनकी सुरीली तान सुनकर हम सभी प्रसन्न थे, 
उस दिन मैंने पहली बार स्वछंदता का अनुभव इस प्रकार किया था...
फिर हम वापस अपने हाउस लौट गए...
परन्तु वापस आकर भी मेरी बेसब्री, अपने मम्मी-पापा के इंतजार में बरकरार थी....
उस समय यदि मेरे पास कोई विकल्प रख देता....
आपको मैजिक पेंसिल चाहिए या आज मम्मी पापा से मिलना है...
मैजिक पेंसिल जो शायद मेरा पहला प्यार है, उस दिन मैं उसका भी तिरस्कार कर देता....
मैंने कुछ देर आराम किया और एक बार फिर अपने सामान को व्यवस्थित कर लिया,
सहसा मार्को भैया दौड़ते हुए आए और मुझसे कहा..
परीक्षित तेरे मम्मी-पापा आ गए, इस छोटे से वाक्य ने मेरे अंदर डोपामाइन की बाढ़ ला दी और मैं खुशी की चरम सीमा का अनुभव करने लगा... 
जीवन की भागदौड़ में खुशियों की तलाश करते हुए हम अपनों से दूर होते जा रहे हैं, हमारा एकमात्र लक्ष्य रुपए कमाने तक सीमित रह गया है, हम केवल बाहरी आडंबर में खुशियां तलाशने की कोशिश में रहते हैं... 
जहां खुशियां हैं ही नहीं, खुशी का सरोकार लग्जरी और साधनों से कदाचित भी नहीं है,
यदि आप किसी इंसान के साथ कुछ पल ठहर कर,
उस लम्हे को खुलकर जी सकते हैं, तभी आप खुशी की चरम सीमा को पा सकते हैं...
खुशियां बहिर्मुखी नहीं अंतर्मुखी होती हैं...

मम्मी-पापा के आने की खबर भैया से मिलते ही मानो मुझे पर लग गए, शक्तिमान की गति से मैं गेट की ओर दौड़ पड़ा..
हाउस के ठीक बाहर आने पर मुझे अपने मम्मी-पापा और छोटा भाई दिखलाई दिए.. 
मैं उस पल को अपने शब्दों में पिरो सकूँ, ऐसा मंजा हुआ लेखक नहीं, बस यह कह सकता हूं कि एक पल के लिए मैं अपनी सारी परेशानियां, जो मुझे नवोदय में रहते हुए उठानी पड़ी थी, वह भूल गया था...
हम लोग हाउस में आ गए, मम्मी-पापा को देखकर मार्को भैया ने अभिवादन किया, मैं कुछ पल के लिए खामोश रहा फिर अपने द्वारा मंगाए गए सामग्री का मैंने जिक्र किया, जिसमें कुछ स्टेशनरी आइटम, शतरंज खाने-पीने की वस्तुएं और अन्य चीजें थी...
तभी मम्मी ने कहा, सामान बाद में देखना पहले खाना खा लो, मुझे भी टिफिन देख कर उसके अंदर लजीज व्यंजन के स्वाद की अनुभूति होने लगी, नवोदय में खाने का स्तर अच्छा ना होने की वजह से मैं घर के खाने को बहुत याद करता था...
आज मुझे एक बार फिर घर के खाने का स्वाद मिलने वाला था, टिफ़िन खोलने पर मैंने पाया कि मेरी पसंदीदा टमाटर की चटनी और चावल की पुड़ियां थी..
मैं उस पर एक टूटने ही वाला था कि पापा ने कहा भैया को भी बांट दो, मैंने भैया को भी पुड़ियां दी, यह मेरे नवोदय जीवन में साझा करने का पहला अनुभव था...
पुड़ियों का स्वाद लेने के बाद मैं घर से आए सामग्रियों की तहकीकात करने लगा... वॉटर कलर, पेंसिल, शतरंज, डायरी और बहुत कुछ...
पर उनमें सबसे अनोखी चीज जो मैंने देखी... "हैंड ग्लव्स" जो पापा ने बताया कि मेरी कज़न दीदी ने अपने हाथों से बनाए हैं, यह देख कर मेरा दिल पसीझ गया...

रिश्तो की अहमियत हमें दूर होने पर ही समझ आती है, सदैव नजदीक रहने पर हम उन भावनाओं की कद्र करना भूल जाते हैं...
दीदी का मुझ पर स्नेह देख कर मैं बेहद खुश था, मुझे यह तोहफा बेहद अनमोल प्रतीत हुआ... उसके साथ-साथ पापा मेरे लिए अलग-अलग स्याही की कलम, और विविध प्रकार के अचार लाए थे...
मैं सारी सामग्री अपने बक्से में सजाने में लग गया, फिर बातों के सिलसिले में पता ही नहीं चला और 2 घंटे बीत गया, मैंने मम्मी को अपना डेली-रूटीन बताया और नवोदय प्रेयर की कुछ लाइंस जो मुझे याद थी वह सुनाया.....
उसके बाद हम कैंपस में टहलने के लिए निकल पड़े.. रविवार का दिन नवोदय में एक उत्सव होता है 
क्योंकि बहुतायत विद्यार्थी के मम्मी-पापा उनसे मिलने रविवार को ही आते हैं, और वह दिन इसलिए भी खास होता है क्योंकि हमें अपने अनुशासित डेली-रूटीन से 1 दिन की मोहलत मिल जाती है...

कितना अच्छा होता है ना जिंदगी में कुछ पलों का यूं बेसब्री से इंतजार करना और वह पल आने पर उस पल को खुल कर जी लेना...
आज की भाग-दौड़ में हम सभी अपना लक्ष्य निर्धारित करते हैं परंतु वह पा लेने पर भी हम उस पल को खुलकर नहीं जी पाते.... हम एक नया लक्ष्य निर्धारित कर चुके होते हैं,
अक़्सर हम देखते हैं जब बारिश होती है सभी अपने आप को बारिश से बचाने का प्रयास करते हैं और अगर असमय बारिश हो जाए तो उस पर नाराजगी भी जताते हैं...
पर आपने कभी किसी छोटे बच्चे को खुद को बारिश से बचाते ना देखा होगा, बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस करने के लिए अपनी हथेलियों में पानी भरकर खुद पर छींटे मारता है, वह कभी बारिश का स्वागत निराश होकर नहीं करता...
बारिश उसके लिए उत्साह का प्रेरक होती है, 
हमारी जिंदगी में संभावनाएं या परेशानियां भी बारिश की ही तरह है... जितना हम उससे दूर भागेंगे, हम अपने आप को दुखों के सागर में डूबता हुआ पाएंगे...
बच्चों की तरह उसका खुलकर स्वागत करना ही इसका उपाय हैं.... कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात कहूँगा....

"खाई है कसम अब खुद को बिलकुल नहीं बचाएंगे,
खाई है कसम अब खुद को बिलकुल नहीं बचाएंगे,
बारिश हो तो सही,
अरे! बारिश हो तो सही, हम ज़रा क्या पूरा भीग जायेंगे।"

लगता है ज्ञान की बातें कुछ ज्यादा हो गई, 
संस्मरण में ज्ञान की अति के लिए माफी चाहूंगा...
मैंने मम्मी-पापा को अपना कैंपस दिखाया, जिसमें अकादमिक बिल्डिंग, मैदान, मंदिर और दुकान शामिल है, देखते ही देखते समय बीत गया और मम्मी पापा के लौटने का समय हो गया, मैं उनके साथ में बाहर चौपाल पर आकर बैठ गया..
हमें वहां बैठे कुछ लम्हे बीते थे कि बांसुरी वाले भैया की आवाज सुनाई दी.. मैंने अपने आपको नवोदय के पहले दिन और आज के दिन के बीच असमंजस में पाया,
क्या आज मेरा पहला दिन ही है..?
मेरी याददाश्त कुछ पल के लिए बांसुरी के धुन में खो गई, थोड़ी देर में बस आ गई तब पापा ने मुझे गेट तक छोड़ कर मुझसे विदा लिया... 
मेरे भीतर तरह-तरह के भाव उमड़ रहे थे, जो मैं अपने शब्दों के माध्यम से कहना चाहूं भी तो नाइंसाफी होगी, परंतु अब नवोदय मेरे लिए विरान नहीं था, अब यह मेरा परिवार बन चुका था.. 
दोपहर का समय था इसलिए मैदान पर ज्यादा लोग नहीं थे, मैं जल्दी-जल्दी हाउस की ओर बढ़ने लगा, की अचानक एक आवाज ने मुझे रोका....

मैं अपने हाउस की ओर तेजी से बढ़ रहा था कि सहसा एक आवाज ने मुझे रोका... 
वह सुधा थी जो शायद अपने पेरेंट्स को छोड़कर मेरी तरह लौट रही थी...
पहले मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे मेरा नाम पता है, मैंने उससे जानना चाहा पर उसके पहले ही उसने जिक्र किया विज्ञान की कक्षा में मैडम बार-बार तुम्हारा नाम लेती है, इसलिए याद है... 
मुझे कुछ पल के लिए अपने आप पर गर्व महसूस होने लगा फिर मैंने उससे पूछा तुम्हारे भी मम्मी-पापा आए थे.... ?
उसने रुंआसे गले से जवाब दिया.... हाँ....., 
हम दोनों एक ही मनोदशा से गुजर रहे थे, अगले कुछ पल हम में से किसी ने कुछ नहीं कहा,
जब आप किसी के साथ हो और आपको एक दूसरे की चुप्पी नहीं खलती, आप वाकई एक अच्छे सहपाठी अथवा प्रेमी हैं....
वैसे तो मुख्य गेट से लेकर मेस तक की दूरी 5 मिनट की ही थी, पर एक दूसरे के साथ कुछ लम्हों को जीने के लिए हम दोनों ने अपनी गति धीमी कर ली थी,
मेरे अंदर की उदासी कुछ कम होने लगी...
परन्तु सुधा अभी भी अपने मम्मी-पापा को विदा करने के दुख से वियोग पीड़ा से गुजर रही थी...
आधी दूरी तय करने तक हमने कुछ एक बातें ही की थी, पर ऐसा महसूस नहीं हो रहा था कि हम एक दूसरे को बस उतना ही जानते हैं, जितना हमने अपने बारे में साझा किया था....
उसने अपनी बेडपार्टनर दीदी के बारे में बताया कि वह कितनी सपोर्टिंग नेचर की है, बातों के सिलसिले में हम मेस तक पहुंच गए....
मेस के ठीक पीछे गर्ल्स हॉस्टल था... हमारा सफर वहीं तक रहा पर मेरा मन चाहता था कि आज दुनिया भर की बातें उससे करता रहूँ.... 
चूँकि मेरा पेट पूरी तरह भरा हुआ था इसलिए मैं हाउस की ओर बढ़ गया.... मेरे मन में अभी भी सुधा के ही विचार आ रहे थे.... 
मन बहुत खुश था क्योंकि आज मुझे महसूस हो रहा था कि नवोदय ने मुझे अपना लिया... नवोदय ऐसी दुनिया है जहां मैंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण गुण सीखे... 
एक दूसरे को सपोर्ट करते हुए सीनियर से अपना बचाव करना, आत्म-विश्वास के साथ अपनी बात कह पाना, स्वावलंबन एवं स्वाध्याय के महत्व को समझना... 
शिक्षकों से भी परिवार जैसा स्नेह मिल सकता है इस बात की अनुभूति नवोदय परिवार ने ही कराई... 
मैं भी उन सैकड़ों विद्यार्थियों में से एक था जो अपने परिवार और गांव को छोड़कर बेहतर शिक्षा के लक्ष्य से इस परिवार से जुड़ा था... 
नवोदय परिवार ही ऐसा है जो हर किसी को अपना बना लेता है, जीवन के मँझधार में नवोदय एक पतवार बनकर आया जो मुझे आज भी जिंदगी के थपेड़ो से सुरक्षित रखता है....
नवोदय में अच्छे व बुरे दोनों अनुभव हुए परंतु अच्छे-बुरे से ऊपर उठकर समता का भाव रखने का पाठ भी नवोदय ने ही सिखाया.... 
कहने को तो बहुत कुछ है परंतु विराम-चिन्ह भी आवश्यक है, नवोदय ने जो कुछ भी दिया, 
उसके भावों को शब्दों में पिरोने कि मेरी क्या ही बिसात फिर भी एक प्रयास कर रहा हूं आप सभी का स्नेह अपेक्षित है.....

था एक बचपन का वो दौर, जहाँ वक्त रहते वह सम्भल गया। 
है वो एक खास जगह, जहाँ तकदीर उसका बदल गया।। 

जेल समझता था उस जगह को, यह बात बड़ी पुरानी है। 
ग्यारह साल का वो डरपोक सा लड़का, जिसके जन्नत की यह कहानी है।। 

आजादी को दाव लगाकर, बड़ों के कहने पर मजबूर हुआ।। 
कैद होकर उन चार दीवारों मे, अपने घरवालों से दूर हुआ।। 

मासूम सी तो सोच थी उसकी, अकेले सोने से डरता था।। 
जब मम्मी पापा की याद आती, चुपचाप रो लिया करता था।। 

नज़रिया बदलकर भूला वो सब कुछ, जो दु:ख उसके दिल मे समाये थे। 
जब मिलने लगा उन सभी अनजानों से, जो उसके जैसे ही वहाँ आये थे।। 

उन अजनबियों के साथ रहते रहते, वक्त न जाने कैसे कटने लगा। 
उन चार दिवारों मे भी उसको, अपनापन जैसा लगने लगा।। 

वहाँ पर रहकर सारे बच्चे, इंसानियत की पाठ सीख जातें हैं। 
वहाँ तो अलग-अलग जाति के लोग भी, एक ही थाली मे खाना खाते हैं।। 

वहाँ उसने बहुत कुछ सीखा जो उसकी जिदंगी मे काम आऐ ।
वहाँ के सारे अजनबी ही आगे जाकर, उसके अपने दोस्त कहलाये।। 

फिर आयी वहाँ से जाने की बारी, जहाँ पहले रहने को वो मजबूर था। 
जाते वक्त आँखों में आँसु नहीं थे, पर दिल मे दर्द जरूर था।। 

अब उसकी जिदंगी आजाद है, वो अपनी कहानी सभी को सुनाता है।
क्योंकि उन चार दिवारों मे बीता दिन, उस लड़के को आज भी याद आता है।।

©परीक्षित

Thursday, August 20, 2020

तुम उर्दू जैसी खूबसूरत

तुम उर्दू जैसी ख़ूबसूरत
मैं हिंदी जैसा सरल
मैं मनमोहन सिंह हूँ बस
तुम मोदी तुम अटल
मैं कम्युनिस्ट की क्रांति हूँ
तुम संघीय हो तुम दल
हम अलग-अलग पर एक से है
जैसे आज और कल
मैं काली चाय तुम कॉफी हो
मैं सर्टिफिकेट तुम ट्रॉफी हो
मैं रिजर्वेशन का धर्मा हूँ
तुम फेमिनिस्म की झांकी हो
मैं अनुराग कश्यप का हीरो तुम हीरोइन धर्मा की हो
मैं तो हर एक जैसा ही हूँ तुम अपनी एक तरह की हो
मैं लेफ्ट हूँ तुम राइट हो मैं हूँ लेनिन तुम फाइट हो
मैं गंगाधर हूं शक्तिमान तुम गौतम की डार्क नाईट हो
मैं पंचो का सरपंच हूँ तुम लन्दन की महारानी हो
मैं जलता फूंकता सूरज हूँ
तुम कल-कल बहता पानी हो
तुम मुझसे जलकर मुझको ढ़ककर 
बादल की होकर निकलती हो
तुम रंगो को धो देती हो
सागर संग मिलकर बहती हो
मैं फिर उगता हूँ फिर जलता हूँ और फिर से लौट जाता हूँ 
फिर किसी रात को किसी शायर की अतिश्योक्ति में आता हूँ
और हिंदी में लिखा जाता हूँ 
तुम उस शायर की महबूबा की
तारीफ़ों मे मिल जाती हो
और नज़्मों सी लिखी जाती हो
तुम उर्दू सी ख़ूबसूरत हो 
मैं हिंदी सा सरल ।।

Tuesday, August 18, 2020

प्यार

"प्यार"

प्यार का दिखावा नहीं 
प्यार सच में करता है,

मैं क्या कहूँ जनाब,
ये क्या क्या करता है,

सुबह की किरणों सा नहीं,
रात में चाँदनी भरता है,

मैं क्या कहूँ जनाब,
ये क्या क्या करता है,

फूलों सा महकता नहीं,
पर उन में रंग भरता है,

मैं क्या कहूँ जनाब,
ये क्या क्या करता है,

पंछियों की आवाज़ नहीं,
खुद पंछी बन उडता है,

मैं क्या कहूँ जनाब,
ये क्या क्या करता है,

राह में शामिल नहीं,
मंजिल पर मिलता है,

में क्या कहूँ जनाब,
ये मुझसे कितना प्यार करता है। ।

©परीक्षित

Monday, August 17, 2020

ठीक हो? सब ठीक है!!

ठीक हो? सब ठीक है?

हां जी। बस यूंही आज चाय की जगह कॉफी पी ली। यूं तो कॉफी से कब कि , - वो क्या बोलते हो तुम? हां ! "ब्रेकअप" हो चुका हैं। लेकिन क्या है ना, पड़ोसी के घर से आज ग़ज़ल सुनाई दे रही थी। 

ठीक हो? सब ठीक है?

हां जी। बस वह पुरानी चिट्ठियां मिली जो तुमने तुम्हारे प्रेमिओं के लिए लिखे थे। जब पहली बार उन में से एक हाथ में थाम दिया था, मेरा उतरता हुआ चेहरा देखकर हफ्ते भर की खुशी तुम्हारे चेहरे में झलक गई थी। हज़ार कहने के बाद भी मुझे विश्वास होता ही नहीं था कि तुम्हारी प्रेयसि इन्सान नहीं, बल्कि शहरे हैं। अब चिट्ठी क्या, उन शहरों के आसमान का रंग भी तुम्हें याद नहीं।

ठीक हो? सब ठीक है?

हां सब ठीक है। बस तुम्हारी दी हुई आखरी किताब के उपर धूल जम गई है। लेकिन वह साफ करने से डरता हूं मैं। पन्नों के बीच बहुत सारी यादें दफ़न है। आज रहने देते हैं।

ठीक हो? सब ठीक है?

बिल्कुल। बस शाम में जब दुनिया भगवान को याद करती है, मुझे तुम याद आते हो। हंसी भी आती है कभी-कभी, क्योंकि सामने ही तो बैठे रहते हो...✍️

©परीक्षित

Friday, August 14, 2020

वसुधैव कुटुंबकम

वसुधैव कुटुंबकम

क्या आपको नही लगता कि आज जरूरत है समाज को एक सूत्र में बांधने की । क्योंकि सामाजिक बिखराव से अन्य समस्याएं कम होने की जगह खाद ही पाएंगी ।

आजकल ऐसी ही फ़ूट डालने वाली शक्तियां काम कर रहीं है। दो समुदाओं के बीच घृणा विवाद फ़ैलाने वाली शक्तियां कहीं न कहीं सफलता का रूप ले रही हैं जिसका फ़ायदा देश के नेता भली भाँति उठा रहे हैं ।।

यह सम्प्रदायिकता इसी आधुनिक युग की देन है जो देश के लिए राजनीतिक समस्या बन देश को खाये जा रही है । हमेशा से ही साम्प्रदयिक उन्माद और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की प्रकृति ने समाज को बांटने की कोशिश की है । हम इसमें इतना डूब गए है कि हमें अशिक्षा , भूखमरी , बेकारी तथा ग़रीबी कुछ भी साम्प्रदायिकता के आगे दिखाई नहीं दे रहा । जबकि हमारा देश इस से लंबे समय से जूझ रहा है।

हमे यह ज्ञात है कि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ हर नागरिक का बिना किसी विभेद के राष्ट्रीय पहचान आयाम है । विविधता के बीच आज एकता और समरसता का नाश हो चुका है । इन सम्प्रदायिक मुद्दों की वजह से ।जबकि हमें यह भी ज्ञात है कि एक समुदाय चाह कर भी एकाकी नहीं कर सकता ।

आप सभी से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि इस मुद्दे को त्याग कर देश हित में योगदान करें । और आपको पता होना चाहिए कि राजनेता सम्प्रदायों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहे और फ़ूट डालो राज करो वाली नीति अपना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे ।

आपको यह भी पता होना चाहिए कि जब यह नीति अंग्रेजो द्वारा अपनायी गई थी तब एकता के खण्डित होने का त्रासद परिणाम भारत विभाजन के रूप में सामने आया था । 

इसलिए सतर्क रहें!!! 

सजग रहें !!!!

धन्यवाद 

©परीक्षित

चाय की टपरी

"चाय की टपरी"

कहते है इंसान को जीने के लिए न्यूनतम तीन मूल आवश्यकताये होती है...रोटी,कपड़ा और मकान।__पर मेरी चार है..रोटी,कपड़ा और मकान के साथ चाय!!

तो ये बात कुछ उनदिनों की है जब गोरखपुर के एक छोटे से किराये के कमरे में ज़िन्दगी जैसे तैसे रफ्तार लिए थी। घर से स्कूल, स्कूल से घर और बीच मे चाय की टपरी, बस इतनी ही मेरी दुनिया थी। स्कूल से घर लौटते समय एक चाय की छोटी दुकान हुआ करती थी, कहने को सिर्फ चाय की दुकान थी लेकिन वहां सुकून, आराम के साथ-साथ सरयू काका के अतीत के किस्से मुफ्त में मिलते थे। काका उस दुकान के मालिक थे..!!

जब भी स्कूल की आखिरी घंटी बजती,मैं थका-हारा सरयू काका के दुकान पर जाता..चाय पीने के साथ-साथ थकान मिटाने।
..........उनकी चाय की मिठास तो याद न रही,पर बाते बड़ी मीठी मीठी करते थे। उनकी उम्र कोई 65 पार होगी।__ कमर थोड़ी झुकी हुई,पोपला मुह, सफेद दाढ़ी,धसी हुए आंखे..!!

बातचीत से पता चला कि उनके परिवार में सिर्फ उनकी बेटी है- सरसतीया ,जो अक्सर दुकान पर हाथ बंटाते हुए दिखती थी!!

शाम को काका के दुकान पर लोगो का जमावड़ा होता था जहाँ राजनीति के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी काफी चर्चा होती थी।..सरयू काका मेरे लिए टूरिस्ट गाइड भी थे। मैं ठहरा उस शहर के लिए अंजान, अजनबी लेकिन काका को शहर का कोना कोना पता था..!!

कुल मिलाकर काका से अच्छी- खासी जान पहचान हो गयी थी। स्कूल की घंटी कभी न भी सुनु लेकिन काका की केतली हमेशा मेरी राह देखती थी।
काका बड़े जिंदादिल इंसान थे,वे अपने जमाने की हर बात बताते..कुछ लोगो के पास सुनाने को कहानिया नही संघर्ष होता है। उनकी बातों से लगता था अतीत में उनके साथ बड़ा हादसा हुआ है या चाय की दुकान खोलना उनकी मजबूरी होगी पर मैंने कभी पूछने की हिम्मत न की।...

.....वे हमेशा कहते जब भी मन अस्थिर हो मेरे पास आ जाना। इस शहर की भीड़ में अकेला महसूस नही होने दूंगा..!!

आज स्कूल से छूटने के बाद मन मे हलचल थी, काका को उनके 10 रुपये देने थे। पिछले शाम पैसे न होने के वजह से मुफ्त में चाय पी ली थी। जान पहचान की वजह से वे कुछ न बोलते। आज उनकी उधारी चुकानी थी!!

जैसे ही दुकान पर हाज़िरी लगाई ,पर ये क्या उनकी दुकान बंद थी। पहले ऐसा कभी नही हुआ था, परिंदे पंख खोलना भूल सकते है लेकिन वो.......!!

घर पहुचा, थकान हावी था, मन मे 10 रुपये का बोझ बढ़ गया था।
अगली शाम फिर स्कूल की आखिरी घण्टी बजने पर छूटा, वही उत्साह लिए दुकान पर गया लेकिन दुकान आज भी बंद थी।यह सिलसिला काफी दिन तक चला। धीरे-धीरे उनकी बाते मस्तिष्क से रिहा हो रही थी!!

आज फिर सुबह जल्दी स्कूल जाना था समय से पहले। शीघ्र ही तैयार होकर स्कूल के लिए निकल पड़ा ,वही रास्ते मे सुकून की दुकान पड़ी। उम्मीद की विपरीत वहा काफी लोग जमा थे,'शायद काफी दिन बाद दुकान खुली होगी इसलिए' सोचकर मैं आगे बढ़ गया चुकि स्कूल के लिए लेट हो रहा था!!

शाम को छुट्टी हुई.. आज मन मे दुगुना,तिगुना, चौगुना उत्साह था..चंद मिनटों में न जाने कितने ख्वाबों की खेती कर ली मैंने। 'आज सबसे पहले पैसे लौटाऊंगा,फिर इतने दिन गायब रहने का कारण पूछुंगा, घंटो समय बिताऊंगा और न जाने क्या क्या!!

जैसे ही दुकान नजर के सामने आयी, ये क्या?? दुकान फिर से बंद। आज सुबह ही तो खुली थी। सबकुछ समझ से परे था।।

पास के सब्जीवाले से पूछा,"क्यो भाई, आज काका की दुकान सुबह ही खुली थी,इस समय बंद क्यो??, और जरा अखबार देना" कहकर मैं अखबार पढ़ने लगा।

वह थोड़ा रुआंसा होकर बोला,'काका आज ही सुबह गुजर गए'।
उसे पता नही उसने कितनी आसानी से कह दिया। मेरे आंखों के आंसू अखबार के पन्नों से दोस्ती कर गए। यू तो अखबार में इतनी सारी बुरी खबर छपी थी,पर इस खबर से ज्यादा बुरा और क्या ही हो सकता था।
मैंने अखबार लौटाया,आसमां में देखा ,कुछ मद्धिम तारे नज़र आ रहे थे।..काश! उनमे से कोई तारा टूटता और मैं उनकी ज़िंदगी मांग लेता।

उस 10 रुपये के साथ साथ,सुकून के पल,उनकी कीमती सलाह, उनकी दी हुई खुशिया, मीठी बाते सबका कर्ज़ मेरे उपर था।

12वी का बोर्ड एग्जाम आने वाला था, स्कूल की छुटिया हो गयी थी। काका की यादें अब क्षीण हो रही थी। एक दिन मुझे स्कूल में एडमिट कार्ड लेने जाना था..रास्ते मे सोचा उनकी दुकान के तरफ देखूंगा भी नही, पर आदत से मजबूर आंखें उधर ही घूम गयी।

आश्चर्य का सिर्फ वही ठिकाना रहा, वहा दुकान नही थी। गरीबी अभिशाप के साथ बाप भी बन चुकी थी। उनकी बेटी सरसतीया ने छोटे से तिरपाल पर खिलौने का दुकान कर लिया था..!!



लफ़्ज़ों के मोती

लफ़्ज़ों के मोती

लफ़्ज़ों के मोती पिरोना,
अच्छा लगता है।

अच्छा लगता है जब, 
ये गले में सजता है।

सजते हैं जज़्बात जब,
लफ्ज़ धड़कन बनते हैं।

बनतीं हैं और भी हसीन ये जब,
लब इन लफ़्ज़ों को छूते हैं।

छू लेते हैं दिलों को ये लफ्ज़ जब,
इन से यादें महकने लगती हैं।

महक उठता है तन बदन जब,
ये लफ्ज़ मीठा सा कुछ गुनगुनाते हैं।

©परीक्षित जायसवाल

Thursday, August 13, 2020

परिंदे

"परिंदे"

उड़ जाना है इन पंछीयों को 
अनंत आकाश में दूर तक ,
सारा जहां घूम आना है 
दिनभर में इनको पंखों के सहारे ,
लेकिन जानते है ये परिन्दे 
कि सांझ ढलने से पहले ,
लौटकर भी आना है इनको 
अपने बनाये छोटे से आशियाने में ,
हर रोज नापना है अपने पंखों से 
आसमान की इन ऊंचाईयों को ,
इन नादान परिन्दों को 
फिक्र नहीं होती अपने कल की ,
हर रोज निकल जाना है इनको 
भोर की पहली किरण के साथ 
हर रोज भरना है एक नयी उड़ान 
इन पंछीयों को 
जीने के लिए 
मरने के लिए..

©परीक्षित

Wednesday, August 12, 2020

तुम

"तुम"

शायर की शायरी,
लेखक की कहानी हो तुम..
संगीत के नग़्मे,
गजल की नज़्में हो तुम..
चकोर की चांदनी,
भोर की लालिमा हो तुम..
ज़िद का एक काफ़िला,
जिंदगी की एक जरूरी काफ़िया हो तुम...

उपवन की खुशबू तो, 
गंगा की पवित्र धरा हो तुम... 
मेरे अल्फ़ाज़ की तहरीरें हो, 
अधूरे इश्क़ की मुकम्मल दास्तां हो तुम... 

शाम की सुकून तो, 
भोर की अज़ान हो तुम.. 
ख़ुदा से बख्शीश में मिली कोई ज़कात हो तुम, 
मंदिर में रखी इबादत की थाल हो तुम.. 
मेरे एहसासों की हर्षमय संवाद हो तुम, 
अधूरे इश्क़ की मुकम्मल दास्तां हो तुम...

कवि की कविता, 
शायर की ग़ज़ल, 
मुक्तक का छंद हो तुम... 
कृष्ण की रुक्मणि तो, 
मर्यादा पुरुषोत्तम कि जानकी हो तुम..
अधूरे इश्क़ की मुकम्मल दास्तां हो तुम...

नर्सरी की नादानियां हो, 
जिंदगी की जिजीविषा हो तुम... 
जहन में उठते हंसी ख़्वाब से हो तुम, 
अधूरे इश्क़ की मुकम्मल दास्तां हो तुम... 

©परीक्षित जायसवाल

पहली बार

#पहली__बार
मैं और मेरी माँ मुर्शिदाबाद के सुतार सिंह गली में एक टूटे फूटे हुए मकान में रहते थे, मैं दस साल का था और माँ चालीस की थीं,
वो तकरीबन हर रोज साड़ी और पीछे से हाफ कट वाला ब्लाउज पहनती थीं. मैं एक लोअर और टी-शर्ट में हफ्ता गुजारता था.
मकान में एक छोटा सा रसोई घर था. रसोई घर में एक स्टोव था और उसके ठीक बगल में मिट्टी का तेल था. तेल का डिब्बा हल्का हल्का टपकता था और तेल रिसता था.
माँ रोज बाहर काम करने जाती थीं. मैं रोज घर में बैठा-बैठा माँ के काम के खत्म होने का इंतजार करता था. माँ देर रात घर आती थीं और खाना बाहर से ही लाती थीं. रसोई घर ठंडा पड़ा रहता था.
मुझें खाने की भूख थीं मुझें खाने के अलावा कुछ नहीं सूझता था. माँ खाने समेत मुझें रसोई में छोड़ कमरे में चली जाती थीं.
दिन में कमरे में ताला लगा रहता था. चाभी माँ अपनी कमर में खोंस लेती थीं. मैं माँ के आने के बाद कमरे में कभी नहीं जाता था. माँ भी कमरे में जाने के बाद रसोई में नहीं आती थीं. घर में सन्नाटा पसर जाता था.
खाना खाने के बाद मैं रसोई में ही सो जाता था. सोने से पहले मुझें सपने नहीं आते थे. लेकिन मकान में लोगों की आवाजाही की आहट मुझें जरूर आती थीं.
देर रात में मुझें हर रोज सपने आते थे. मेरे सपने में कभी कोई परी, ताजमहल, चॉकलेट का डिब्बा और स्कूल नहीं आया.
मेरे सपने में रोज एक औरत आती थीं. औरत हर रोज बिस्तर पर तरह-तरह के मर्दो के साथ हम संग मिलती थीं. मैं सपने में शांत रहता था लेकिन वो खूब चीखती चिल्लाती थीं. मैं खाली पेट नहीं सोता था इसलिए मुझें दर्द नहीं होता था लेकिन उस औरत को बेतहाशा दर्द होता था. शायद वो बहुत भूखी थीं ऐसा लगता था उसे भूखा रखा जाता था. फिर एकदम सब शांत हो जाता था.
मैं सुबह जल्दी उठ जाता था. माँ देर से उठती थीं. मैं रसोई घर में आंखे खोले ही लेटा रहता था. मिट्टी का तेल रिसता हुआ मेरे लोअर को भिगो देता था. मैं उसे सुखाने के लिए कोई प्रयास नहीं करता था.
मैं स्कूल नहीं जाता था और मेरे कोई दोस्त भी नहीं थे. मैं बाहर खेलता नहीं था. माँ जब उठती और कमरे से बाहर आती थीं तो उनके बाल बिखरे होते थे. उनका चेहरा एकदम फूहड़ लगता था और उनकी साड़ी गन्दी नज़र आती थीं जिस पर कई जगह लाल धब्बे साफ झलकते थे. और उनकी वो हाफ कट वाली बलाउज पीछे से फुल कट वाली हो जाती थीं. ऐसा लगता था माँ बहुत खेल कूद कर बाहर आई हैं. शायद कमरे में कोई खेल का मैदान था. जो रसोई घर में नहीं हैं और इसलिए मैं खेल नहीं पाता.
माँ नहा धोकर काम पर चली जाती और मैं दिन भर घर पर पड़ा रहता था. कुछ रोज बाद माँ काम पर नहीं जाने लगी. और उसके कुछ रोज बाद माँ कमरे में ही पड़ी रहती. अब माँ खाना बाहर से नहीं लाती और मैं भूखा रहने लगा.धीरे धीरे माँ बहुत कमजोर होने लगी.
माँ बहुत ज्यादा कमजोर हो चुकी थीं इसलिए अब खेलती नहीं थीं और ना ही उनके बाल सुबह में बिखरे होते थे. उनके बदन पर एक ही साड़ी रोज़ रहने लगी.
अब मुझें सपने में वो औरत जो चीखती चिल्लाती थीं जिसे रोज ही दर्द होता था. एकदम शांत और कमजोर दिखाई देती थीं.
मैं और माँ दिन रात सोते रहते थे. माँ कमरे में सोती थीं और मैं रसोई घर में. मिट्टी का तेल रिस्ते रिस्ते मेरे लोअर को तर कर चुका था.
उस रात पहली बार माँ ने मुझें उस कमरे में बुलाया. जहाँ एक मैदान था और जिस मैदान में माँ रोज खेलती थीं. जब मैं उस कमरे में दाखिल हुआ तो कमरे में कोई मैदान नहीं था और ना ही कोई खेलने की चीज़ थीं.
कमरा एक चारपाई और गन्दी बदबू से भरा हुआ था. उस रोज माँ ने मुझें पहली बार गले लगाया, पहली बार मुझें माथे से लेकर मेरे पूरे बदन को चूमा, पहली बार मुझें अपनी गोद में सुलाया, पहली बार मुझें लाड प्यार किया. उस रोज सब पहली बार हुआ.
पहली बार माँ ने मुझें तकिए के नीचे से निकालकर एक गोली दी जो हमनें एक साथ खाई. पहली बार मुझें सोने के बाद कोई सपना नहीं आया.

Tuesday, August 11, 2020

सुबह की अज़ान

"सुबह की अज़ान"

मेरी सुबह की अज़ान हो तुम,
मेरे चेहरे की मुस्कान हो तुम,
मेरे आत्मविश्वास के पीछे का राज हो तुम,
मेरी हर नब्ज़, हर नज़्म हो तुम,
करूँ जिससे मैं इजहार-ए-इश्क़ वो तलाश-ए-महबूब हो तुम।।

ठहर जाऊ जिसे मैं देख, वो लम्हा हो तुम,
नि:शब्द हो जाऊं जिसे सुन,वह संगीत हो तुम,
जिस संगीत को हर पल गुनगुनाऊं, वो तराना हो तुम,
साज़ हो तुम, अरमान हो तुम,
इस दिल की मीठी सी एहसास हो तुम।।

प्यार, इश्क, चाहत, तलब, नशा हो तुम,
खूबसूरत मंजिल हो तुम,
जो कुछ भी हो तुम, बस इतनी सी हो,
इस कान्हा की रुक्मणी हो तुम,
मेरी जिंदगी की शिरोमणि हो तुम,
इस कान्हा की रुक्मणी हो तुम।।

©परीक्षित जायसवाल

Monday, August 10, 2020

"नवोदय का पहला दिन"

"नवोदय का पहला दिन" 

"तुम पास हो गए" की एक उतावली एव उत्साह से भरी हुई आवाज के साथ घर की देहरी को पार करते हुए चाचा जी ने जैसे ही यह बात कही, मेरा मन उत्साह से हिलोरे लेने लगा। वैसे अपने द्वारा की गई मेहनत और लगन पर मुझे पुरा भरोसा था परंतु हुबहू वैसा ही परिणाम पाकर मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा था। कुछ ही पलों में यह समाचार मेरे मित्रों के माध्यम से पूरे गांव में फैल गया। जितना मैं खुश था उतना तो शायद जंग जीतकर लौटा हुआ फौजी भी ना होता होगा, परंतु मेरी खुशी में मेरी मेहनत साफ झलक रही थी । शाम होने को आयी , घर वालों ने यह पूछना भी शुरू कर दिया - बताओ आज क्या खाना चाहते हो ? उस रात खीर, पूड़ी के साथ मनपसंद सब्जी का स्वाद चखा परंतु मेरे पास होने की खुशी से वह भी कम था।
अगले दिन सुबह उत्साह अपने चरम पर था, मैं चाचा जी के पास पहुंच कर विद्यालय की औपचारिकताओं को पूरा करने के बारे में बात करने लगा। धीरे-धीरे करके सारी औपचारिकताएं पूर्ण हो गई ।
अब विद्यालय में प्रवेश लेने का समय आ गया, तदोपरांत चटाई, बक्सा, बाल्टी और मग्गे का भी इंतजाम हो गया।

वाकया है 8 जुलाई 2009 का जब मुझे नवोदय विद्यालय में प्रवेश लेने जाना था, उस दिन मैं सवेरे जल्दी उठकर पापा के साथ तैयार होकर बिलासपुर जाने के लिए बस का इंतेज़ार करने लगा , न जाने क्यों उस दिन मुझे अपने गाँव की मिट्टी से एक अलग ही लगाव और प्यार महसूस हो रहा था ।
वैसे तो मेरा दिल नवोदय के दर्शन के लिए उतावला था, पर मैं अपने गांव से जुदा होने के दुःख और अपने दोस्तों से दूर जाने की बात से हतोत्साहित भी था ।
मेरा गाँव मेरे जिले के नवोदय विद्यालय से करीबन 90 कि. मी की दूरी पर स्थित है ।।
बस की यात्रा 3 से 4 घण्टे की थी तो मुझे भी सोचने के लिए ख़ूब वक़्त मिल गया ।
कभी मन में आता की नवोदय विद्यालय भी हैरी पोर्टर के हॉगवर्ट्स की तरह शानदार होगा और मुझे भी अपनी हरमोइनी (हैरी पॉर्टर सिरीज़ की अभिनेत्री) मिलेगी,
तो कभी मन में नए जगह का भय भी होता था ।
किसी प्रकार सोच में डूबे हुए अपनी यात्रा पूरी करने के बाद हम विद्यालय पहुंचे ।
विद्यालय का भव्य द्वार देखकर मेरे मन मे लड्डू फूटने लगे ।
अंदर प्रवेश करने पर अशोक वृक्ष की ताजी हवा ने हमारा स्वागत अपनी बाहें फैलाकर इस प्रकार किया मानो वो मुझे अपने आलिंगन में समेट लेना चाहती हैं। वातावरण बाहर जितना शान्तनुमा था, मेरे भीतर उतना ही अधिक उफान भर रहा था ।
कुछ ही दूर चलने पर सामने एक बोर्ड लगा हुआ दिखाई पड़ा जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित था ।

"खेलो इतना खेलो की खेल पढ़ाई बन जाए
पढ़ो इतना पढ़ो की पढ़ाई खेल बन जाए"

आगे बढ़ने पर हम अकादमी बिल्डिंग के प्रवेश द्वार पर थे। वहीं पर मैंने सबसे पहले गौतम बुद्ध की प्रतिमा के दर्शन किए, जो हमारे कला अध्यापक के द्वारा निर्मित थी ।
"बुद्धम शरणम गच्छामि" सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ था, जो अब तक मैंने नैतिक शास्त्र की किताबों में ही पढ़ा था ।
ऑफिस के औपचारिक कार्य हो जाने के बाद हम प्राचार्य कक्ष पहुंचे, जहाँ पर बी.के.मोहंती जी(प्राचार्य) द्वारा विद्यार्थियों का एक प्रकार का साक्षात्कार लिया जा रहा था।
यह साक्षात्कार हमारे नवोदय के प्रति प्रतिबद्धता को जाँचने के संबंध में था।
सवाल बड़े अनूठे थे। 
करेले की सब्जी मिलेगी तो खाना खाओगे ?
मम्मी पापा की याद में रोओगे तो नहीं ?
और कुछ हास्य की बातें भी हुई, 
पर मैं अब भी थोड़ा सहमा हुआ-सा था।
बाहर निकलने पर प्रवेश के लिए आए हुए सहपाठियों को देखकर मन और भी बेचैन होने लगा।
मेरी पहचान का वहां कोई भी नहीं था।
मेरा मन कुछ डरने सा लगा था, 
कुछ देर के बाद शिवालिक हाउस (नवोदय विद्यालय में विद्यार्थियों के हॉस्टल के नामों में से एक)
के कैप्टन गोपाल भैया मिले और हमें हाउस लेकर गए। उनके अपनेपन भरे शब्दों से मुझे थोड़ी राहत मिली परन्तु मैं अब भी निराशा की स्थिति से पूरी तरह नहीं निकल पाया था।
गाँव से मीलों दूर एक नई दुनिया में मैने अपने कदम रखे थे और आने वाला कल क्या दिखलाएगा इसकी भी मुझे कोई खबर नहीं थी ।
परन्तु मैं रोना नहीं चाहता था , क्योंकि यह नई दुनिया मुझे बहुत कुछ सिखाने वाली थी।
हॉस्टल पहुंचकर अपना सामान व्यवस्थित कर हम खाना खाने के लिए भोजनालय की ओर चलने लगे, तभी मैने देखा कि कुछ विद्यार्थी अपनी उंगलियों पर थालियों को घुमाते हुए जा रहे थे। 
भोजनालय पहुंचकर मैंने अपने लिए थाली लिया और खाने के लिए डाइनिंग टेबल पर बैठ गया,
खाने में राजमा-चावल था, जो मेरे लिए एक नया व्यंजन
था, एक ही दिन में इतना कुछ नया अनुभव करना रोमांचित करने के साथ-साथ एक डर भी पैदा करता है। 
खाना हो जाने के बाद जब हम वापस हॉस्टल पहुँचे तो मुझे अपने बेड पार्टनर की गुण-गाथा कप्तान भाई जी द्वारा विस्तार से जानने को मिली की मेरे बेड पार्टनर कितने शालीन, संयमवान, गाँधीवादी और विद्वान हैं।
इतनी तारीफ सुनने के बाद मेरा मन भी उतावला हो उठा उनके दर्शन के लिए। 

करीबन 20 मिनट बाद विवेक मार्को भैया हाउस आए, उनका स्वभाव और हंसमुख चेहरा देखकर लगा की नवोदय की इस दुनिया में मुझे एक सहपाठी मिल गया। 
नवोदय में बेड पार्टनर के क्या संबंध होते हैं यह सिर्फ नवोदय विद्यालय का एक विद्यार्थी ही समझ सकता है। 
इस रिश्ते को शब्दों में बयां करना कदाचित मुश्किल है। एक नवोदयन का अपने पहले बेड पार्टनर से एक अलग ही जुड़ाव होता है। 
इसी प्रकार मेरा भी था, 
विवेक भैया अपने नाम की ही तरह विवेकशील मालूम होते थे, पापा और उनकी बातचीत हुई जिसमें पापा द्वारा मेरा ख्याल रखने का जिम्मा मार्को भैया को सौंपा गया। 
अब पापा के वापस लौटने का समय हो गया, 
मेरे साथ हाउस कप्तान गोपाल भैया और मार्को भैया भी थे। मैं उस समय भी रोना चाहता था मगर तब तक मेरा मन अपने आप को संभाल चुका था। 
आज सहपाठी के रूप में गोपाल और मार्को भैया भी मिल चुके थे, पापा के जाने के बाद मन थोड़ा भारी हो गया था, अब तक मैं नए जगह को लेकर कुछ उत्साहित था पर अब अंतर्मन की वेदना की वजह से वह उत्साह धूमिल हो रहा था। 
प्रवेश द्वार के भीतर आने पर मुझे एक बांसुरी वाले की मधुर तान सुनाई दी। वह भी उसी चौपाल पर बैठा था, जहां मैं कुछ समय पहले पापा के साथ बैठा हुआ था। उसकी मधुर तान सुनकर किसी के भी चेहरे पर मुस्कान आ सकती थी। 
पर मुझे वह मधुर और सुरीला साज अपने परिवार की विरह पीड़ा को बयां करता महसूस हो रहा था। 
मैं खुलकर रो लेना चाहता था, पर मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं रो क्यों नहीं पा रहा था, 
शायद इसलिए कि मुझे दुलारने के लिए मेरी मां वहां पर नहीं थी, 
हम सभी को एक न एक दिन अपने घर वालों से दूर अच्छी शिक्षा की प्राप्ति के उद्देश्य से जाना ही पड़ता है। एक नवोदयन के जीवन में यह दीक्षा-संस्कार बाल-अवस्था में ही हो जाता है,
जिस उम्र में बच्चे पोगो और कार्टून नेटवर्क देखते हैं उस उम्र में एक नवोदयन जिंदगी के फलसफे सीखता है। 
नवोदय की दुनिया अपने आप में अनूठी है जिस प्रकार होगवार्ट्स (हैरी पॉटर का जादुई स्कूल) पहुंचने के लिए आपका जादुई कला में प्रतिभावान होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी भी प्रतिभाओं से परिपूर्ण होते हैं। हर कोई अपने आप में खास होता है और अपने पिछले विद्यालय का एक उत्कृष्ट विद्यार्थी होता है। 
उसे JNVST की परीक्षा में उसी प्रकार "परीक्षित" होना पड़ता है, जिस प्रकार हैरी पोर्टर में हॉग्वार्टज़ जाने के लिए प्लेटफॉर्म नम्बर 9'3/4 (हॉग्वार्टज़ का प्रवेश द्वार) में निडर होकर कदम रखना होता है। 
लिहाजा नवोदय में जादू की शिक्षा से भी महत्वपूर्ण जिंदगी जीने की शिक्षा दी जाती है। 
मैंने वापस अपने हाउस पहुंचकर कुछ देर आराम किया ही था कि "रिमेडियल" नामक एक नया शब्द मेरे शब्दकोश में जुड़ा,
मैं मार्को भैया के साथ अकादमीक कक्ष की ओर चल पड़ा, रास्ते में रंग-बिरंगे टी-शर्ट पहने विद्यार्थियों को देख कर मन में उत्सुकता हुई, पर शायद मेरे मन की बात मार्को भैया ने भांप ली और बताया कि यह हाउस ड्रेस है। 
अरावली-नीला, नीलगिरी-हरा, शिवालिक-लाल & उदयगिरि-पिला, 
शायद तब से ही मेरा पसंदीदा रंग लाल है चूँकि मैं शिवालिक हाउस से था। 
अकादमीक कक्ष में प्रवेश करते हुए वहां पर लिखा एक वाक्यांश पढ़ा ;
"Come In To Learn,
Go Out To Serve"
इस वाक्यांश के मायने समझने के कमोबेश में, मैं किसी तरह अपनी कक्षा पहुंचा। 
कक्षा दो भागों में विभाजित था,
मैं "ए" सेक्शन की एक बेंच पर जाकर बैठ गया। 
अभी मैं उस वाक्यांश ;
"Come In To Learn, 
Go Out To Serve"
को समझने की कोशिश ही कर रहा था, कि सहसा मेरी नजर मेरी कक्षा की एक लड़की पर पड़ी, 
उसने चटक लाल रंग का एक सलवार-शूट पहन रखा था। 
मेरा मन परिवार के वियोग से निकलकर, प्रेम के सागर में गोते लगाने लगा, यह निश्छल प्रेम था। 

"एक प्रेमी को सर्वाधिक प्रेम करना चाहिए,
अपनी प्रथम प्रेम की निश्छलता से।"
(कहीं पढ़ा था)

मेरे अंदर किसी भी प्रकार की आकांक्षा जागृत नहीं हुई, बस मैं प्रेम को महसूस कर रहा था। 
प्रेम जो भक्ति की सर्वोच्च शाखा है,
उनकी मुस्कान बहुत प्यारी थी और उनका स्वभाव भी बेहद सरल था उनका नाम था....

"दुनिया में सबसे आसान है प्रेम करना, इससे आसान भला क्या होगा।
प्रेम एक ऐसी चीज़ है जो बस हो जाती है। 
ना तो उसे करने से पहले सोचना पड़ता है ना ही करने के बाद। 
प्रेम में बुद्धि का कहीं कोई स्थान नहीं होता। 
प्रेम के होने को बस महसूस किया जा सकता है। 
उसके होने की कोई प्रक्रिया नहीं होती। 
जैसे पलकों का झपकना, अचानक से ज़ोर की छींक का आ जाना। 
आपके पास सोचने का समय नहीं होता और प्रक्रिया पूरी भी ही जाती है। 
इसी प्रकार प्रेम है। 
ये आपको सोचने का समय नहीं देता। 
आपने बगीचे में गुलाब का फूल देखा तो आप उससे प्रेम करने से पहले सोचते नहीं है। 
वो खुद व खुद आपको अपनी तरफ खींच लेता है। 
उसी प्रकार प्रेम आपको आकर्षित करता है।"❤️

मेरे अंदर का दार्शनिक उसे देखकर जागृत हो गया था, मैं उसकी मुस्कान पर लप्रेक लिख सकता था,
उसकी खूबसूरती पर कविताएं लिखी जा सकती थी, उसकी जुल्फों पर गजल और शायरी का मिलन हो सकता था, 
यदि उस समय लाइब्रेरी मैडम कक्षा में नहीं आती, कक्षा में आकर मैडम ने हम सभी विद्यार्थियों को संबोधित किया, कक्षा के सभी बच्चे उनको ध्यान से सुन रहे थे, सभी के चेहरे पर उत्सुकता झलक रही थी ।
सभी के लिए यह अनुभव नया था, मेरे लिए तो बेंच पर बैठना भी एक अनूठा अनुभव था क्योंकि गांव में अपने विद्यालय में मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा टाट पट्टी पर बैठकर ही ग्रहण की थी ।
लिहाजा हम सभी विद्यार्थी इस नएपन के उमंग में और अपने परिवार से वियोग की पीड़ा के बीच कश्मकश से गुजर रहे थे,
अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्र से होने की वजह से हमारी कक्षा के बहुतायत विद्यार्थी हिंदी माध्यम से थे, इसलिए हमारे लिए पाठ्यपुस्तक की व्यवस्था भी हिंदी माध्यम में की गई थी ।
मैं अभी भी उसकी मुस्कान निहार रहा था, पता ही नहीं चला और रिमेडियल की छुट्टी हो गई, 
मैं अब तक उनका नाम भी नहीं जान पाया था।
रिमेडियल के उपरांत हाउस जाकर मैंने किताबों के सिलसिले में मार्को भैया से बातचीत की, और अपनी कक्षा के कुछ विद्यार्थियों से परिचय भी हुआ । 
मैं अभी यह पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पा रहा था की मैं अपने परिवार से दूर एक अलग ही दुनिया में हूँ,
शाम होते ही मुझे अपने घर की चाय की प्याली याद आने लगी ।
मैं मन-मसोस कर रह गया, चाय से मेरा नाता अटूट है ;

"जितनी कड़क होगी उतनी ही लजीज होगी,
चाय भी कुछ जिंदगी सी है"

हाउस से निकलकर मेरे कदम खेल के मैदान की ओर बढ़े, ऐसे खेल जिनका मैंने केवल नाम सुना था आज अपनी आंखों के सामने देखना भी एक अनूठा अनुभव था,
हॉकी, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल.....
सहसा मुझे अपना पसंदीदा खेल दिखाई दिया... शतरंज...😊
मैं वहाँ पर बैठकर उत्सुकता से देखने लगा, शायद कुछ सीनियर खेल रहे थे.. मैं इस खेल की बिसात समझने में पिछले दो साल का अनुभवी था,
मैंने एक पक्ष की मदद की और वह जीत गया,
हारने वाला पक्ष मुझसे कुछ नाराज़ भी हुआ,
वापस लौट कर मैं तैयार हुआ और सुपरविज़न के लिए एक सहपाठी के साथ अकादमीक कक्ष की ओर चल पड़ा,
सुपरविजन का तात्पर्य स्वाध्याय होता है, 
जो मुझे आने वाले समय में ज्ञात हुआ, स्वाध्याय के पूर्व 6:00 बजे संध्या प्रार्थना के लिए सभी mp hall में इकट्ठा हुए, 
उस दिन संध्या प्रार्थना मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे और पहले अनुभवों में से एक था, 
"हे शारदे मां" का गान सभी विद्यार्थियों द्वारा मिलकर किया गया,
पहली बार मैंने इस प्रकार के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट देखे, जैसे कॉंगो, क़ेसिओ....
पार्थना के बाद हम अपनी कक्षा पहुंचे, मेरी निगाहें उस मंद मुस्कान की तलाश करने लगीं,
कुछ समय दोस्तों से परिचय का सिलसिला चला, 
उसके बाद हमें ग्रन्थालय जाने का आमंत्रण मिला, 
हम सभी विद्यार्थी ग्रन्थालय में कतार लगाकर अपनी बारी का बेसब्री से इंतजार करने लगे, पर मेरी निगाहें उस भोली मुस्कान की तलबगार होने लगी, 
कुछ दोस्त पुरानी किताबें मिलने की वजह से निराश थे परन्तु मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, क्योंकि किताबें मुफ्त मिल रही हैं,
सहसा लड़कियों की कतार से बुलाने के लिए मैडम ने एक नाम पुकारा ; ******
भीड़ की आवाज़ में उसका नाम धूमिल हो गया औऱ मैं उनका नाम जानने से रह गया ।
मेरी नजरें उस ओर ही ठहर गई, यह वही थी जिसका जिक्र मैंने अब तक हरमोइनी के रूप में किया, 
वह भी किताबें पाकर बेहद खुश थी, वापस कक्षा में आकर सभी ने अपने किताबों पर अपने हस्ताक्षर अंकित किए ।
मुझे अपने नाम को लेकर बचपन से ही एक प्रकार का गर्व था, मैं अपनी बेकार हैंडराइटिंग से अपना नाम लिखकर अपने अभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था, 
इसलिए मैंने अपने किताबों पर अपना नाम उस समय नहीं लिखा, पर मेरी नजरें अपना नाम अंकित करती हुई इस कहानी की अभिनेत्री की ओर बढ़ी और मैं उसकी लिखावट के अंदाज से उसका नाम जानने की कोशिश करने लगा, पर मेरी कुशाग्र बुद्धि ने मेरा साथ नहीं दिया मैं अपनी कक्षा में अपने क्षेत्र से आए सहपाठी की तलाश करने लगा नवोदय में एक बात पक्की होती है कि यदि कोई सहपाठी अथवा सीनियर आपके गांव अथवा क्षेत्र से है तो उनसे आपकी प्रगाढ़ मित्रता निश्चित है,
लिहाजा रात्रि के 8:00 बजते ही घंटी बजी, सभी हाउस जाने की होड़ में किताबें समेटने लगे, शोरगुल होने लगा पर हरमोईनी बहुत ही शालीनता से कक्षा से बाहर निकली, मन में आया कि जाकर उनका नाम पूछ लूँ पर हिम्मत नहीं जुटा पाया ।
रात्रि भोज के लिए मैं अपने एक सहपाठी के साथ डाइनिंग हॉल पहुंचा,
खाने का स्तर देखकर सहसा ही मां की याद आ गई, और मेरा दिल अंदर ही अंदर विलाप करने लगा ।
अपनी थाली लेकर मैं टेबल पर बैठा ही था की अचानक मुझे एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी,
मैं पीछे मुड़ा और देखा की आराधना दीदी खड़ी थीं जो मेरे गांव के समीप रहती थीं,
और नवोदय आने से पहले उनसे मेरी मुलाकात हो चुकी थी, उन्हें देखकर मेरे हृदय की वेदना कुछ कम हुई ऐसा लगा कि नवोदय की इस वीरान दुनिया में मेरा मार्गदर्शन करने और ध्यान रखने वाला कोई मिल गया । नवोदय प्रवेश से पहले उनसे मेरी मुलाकात सिर्फ़ एक ही बार हुई थी, 
परंतु उन्हें देखकर जो अपनापन महसूस हुआ उसे शब्दों में पिरो देना उस स्नेह की भावना का अपमान होगा।
मेरे मन का संबल धीरे-धीरे प्रबल होता जा रहा था, क्योंकि दिन की शुरुआत से लेकर अब तक मुझे कुछ लोग ऐसे मिल चुके थे जो मुझे अकेले होने का आभास नहीं होने देते । 
दीदी से मिलना अपने गांव की मिट्टी का स्पर्श पा लेने जैसा महसूस हुआ, और मेरे दिन भर की थकान भी कुछ देर क़े लिए दूर हो गई ।
दीदी कक्षा 11वीं में थी इसलिए मैं अपने आप को उनके सानिध्य में सुरक्षित महसूस कर रहा था ।
उनसे थोड़ी देर बातचीत हुई और उसके बाद उन्होंने मेरा परिचय अपने सहपाठियों से कराया, 
जिससे मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई ।
मैं अपने टेबल की ओर लौट ही रहा था कि अचानक एक नाम की मेरे कानों में आवाज गूंजी, 
मैंने देखा कि गर्ल्स हाउस की हाउस मिस्ट्रेस नए प्रवेश लिए बच्चों का अटेंडेंस ले रही थी....

उन्होंने पुकारा ; "सुधा रतावल"... 
.............................. 
... 
यह वही थी जिसके मंद मुस्कान पर मैं मोहित था, इस कहानी की अभिनेत्री हरमोइनी... 
मैं कुछ पल के लिए वहीं पर स्तब्ध खड़ा रहा, फिर खाने के टेबल की ओर बढ़ गया, टेबल पर पहुंचा तो देखा कि एक सहपाठी ने मेरे लिए भी खाना निकाल दिया है, 
यह देखकर मुझे नवोदय की इस वीरान दुनिया से प्रेम होने लगा था ।
सभी सहपाठियों भैया एवं दीदी द्वारा मैत्रीपूर्ण और स्नेहिल व्यवहार से मैं बहुत खुश था, 
मेरी जिंदगी में एक नया फ़लसफ़ा जुड़ा, 
ख़ुश रहने के लिए सिर्फ़ साधनों की जरूरत नहीं है,
चंद अच्छे दोस्त भी ख़ुशनुमा जिंदगी जीने के लिए जरूरी हैं.... 
खाना पूरा होने के बाद मैं हाउस वापस आ गया ।
वैसे मैं अपने हाउस का नाम भी ठीक तरह से याद नहीं कर पाया था.. दीदी के पूछने पर भी मैं "शिव" "शिवलिंग" "शिवाय" बोलता रह गया था, 
लिहाजा उन्होंने समझ लिया था, 
हाउस वापस आने पर मार्को भैया ने मुझे बताया, की थोड़ी ही देर में हमारे हाउस मास्टर आएंगे,
मुझे इस शब्द का आशय तो मालूम नहीं था, पर इतना जरूर समझ पाया की कोई अध्यापक आने वाले हैं, थोड़ी ही देर में हमारे हाउस मास्टर पधारे ।
हमारे हाउस मास्टर काफी वरिष्ठ शिक्षक थे, अटेंडेंस लेने के बाद उन्होंने नवागंतुक छात्रों से बातचीत की... उनका बातचीत करने का रवैया अपनापन भरा था, 
हम सभी के जीवन में अध्यापक एक एक विशेष महत्त्व होता है, शायद इसलिए अध्यापक को भगवान का दर्जा भी दिया गया है..
मेरे लिए हमारे हाउस मास्टर भी कुछ ऐसा ही महत्व रखते थे, उनके अनुभवों को सुनना मोटी किताबों को पढ़ने से बेहतर था, 
बहरहाल उस दिन ज्यादा बातचीत नहीं हुई , 
वे हाउस का मुआयना करके वापस चले गए... 
बिस्तर पर लेटते ही मन में तरह-तरह के विचार आने लगे....
जैसे यदि मेरे पास हैरी पोर्टर की छड़ी होती, तो मैं छड़ी घूमा कर "वैनगाडियम लेवियोसा" जैसा कोई मंत्र बोलकर या सोनपरी की तरह "इत्तु बीतु झिम पतुता" बोलकर घर चला जाता.... 
मुझे मालूम है यह सारी बातें आपको हास्यास्पद लग रही हैं परंतु एक 10 साल क़े बच्चे से अब आप कितनी समझदारी की उम्मीद करेंगे, 
अपने पुराने स्कूल के दोस्तों की याद भी आने लगी... 
कुछ पंक्तियां उनकी याद में ;

"पुराने दोस्तो की भीड़ ना जाने, 
कहाँ गुम हो गई...
अरे अभी तो सब यहीं थे ....
लगता है शायद स्कूल की छुट्टी हो गई....
मेरे साथ लुका-छिपी खेल रहे हो क्या... 
या फिर ये कोई मज़ाक है...
वापस तो आओ य़ारों, 
अभी बाकी बहुत हिसाब है..."

खाने के बाद भी मेरा पेट नहीं भरा था, क्योंकि मैंने उस स्तर का खाना पहले कभी नहीं खाया था, फिर भी मैं किसी से इस बारे में कहने में संकोच कर रहा था, 
मेरे alternate अपोजिट बेड पर आशीष कश्यप भैया रहते थे, शायद उन्हें मेरा मुरझाया चेहरा देखकर इस बात का अंदाज़ा हो गया, और उन्होंने अपने बक्से से निकाल कर मुझे बिस्किट ऑफर किया ।
एक नवोदयन का बक्सा उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं होता, और उसमें रखे तरह-तरह के व्यंजन उसके लिए हीरे-मोती के समान होते हैं, 
अली बाबा की गुफा की तरह इसे खोलने के लिए भी "खुल-जा-सिम-सिम" जैसा मंत्र चाहिए होता है ।
बक्से के मालिक को मक्खन लगाना इसके लिए अचूक राम-बाण है ।
परन्तु मुझे यह सब नहीं करना पड़ा था, बिस्किट खाते हुए मेरी उनसे कुछ बातें हुई, जिसमें अगले दिन में क्या-क्या होने वाला है, इसका ब्यौरा उन्होंने दिया,
शक्तिमान सीरियल की कुछ बातें भी हमनें की,
मैंने उन्हें बताया कि गीता विश्वास को पता चल गया है कि गंगाधर ही "शक्तिमान" है ।
बातों के सिलसिले में मुझे एक बार फिर अपने घर की याद आ गई, मेरी स्थिति उस समय कुछ ऐसी थी जो शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है, 
पर मेरी यह कविता आपको मेरी स्थिति का आभास करा सकती है ;

चाहता हूँ बहुत कुछ कहना , पर शब्दों की कमी है !
दिल परेशां है , आँखों में कुछ नमी है !
ना जाने क्यों शब्द डगमगा रहे है ,
ना जाने क्यों जुबां लड़खडा रही है ,
ना जाने कैसा तूफान है , बस खामोशी छा रही है !
चाहता हूँ खामोश रहना , नब्ज़ कुछ अनमनी है !
दिल परेशां है , आँखों में कुछ नमी है !

इस प्रकार नवोदय में मेरा पहला दिन बीता, उम्मीद करता हूँ आपका भी कुछ ऐसा ही रहा होगा । आप सभी के स्नेहाशीष के लिए हृदय से आभार,
एवं इस संस्मरण को ढेर सारा प्यार देने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया..😊

©परीक्षित जायसवाल

Sunday, August 9, 2020

काश

"काश"

काश कि नहीं ही होता, कोई काश,
काश कि सारे काशों की, बिछ जाती लाश।

कितने सपनों, अरमानों, दीवानों का क़ातिल,
क़त्ल होता कभी खुद भी, मक़तूल हो जाता ये काश।

उसे कुछ तो कहना था, यूं न चुप रहना था,
कुसूर भला था ही क्या, किसको नहीं बेहतर की तलाश।

साथ खड़े थे सब, कितनी दुआएं, तोहफों के साथ,
पर दिल से जिसे क़ुबूला उसने, वो था महज़ काश।

रंग बिरंगी रौशनियों में, महकती खुशबुओं के साथ,
सजाया जिसे ताज़िए-सा, विदा हुई वो, जैसे लाश।

दरवाज़े, दीवारें, ताले, चाबी, दहलीज़ ओ दराज़,
बाजाहिर थे चुप, यूं तो सारे,
लबों पर सबके, ठहर गया था मगर एक काश!

©परीक्षित जायसवाल

गांव की मिट्टी बुलाती है

"गांव की मिट्टी बुलाती है"

न जाने कौन से शहर में रहते हो
न तुम्हारा पता है और न ही ठिकाना
फिर भी तुम्हें पत्र लिख रहा हूँ
तुम्हें गांव की गली बुलाती है
खेतों की मिट्टी तुम्हारे स्पर्श के लिए तड़पती है
और हमारी आंखें चारों दिशा तुम्हें ही ढूंढा करती है
न जाने कौन से शहर में रहते हो
क्या तुम्हें इतनी मशरूफियत है कि
अपने अतीत के पन्ने तक पलट नहीं पाते
क्या तुम्हें अपने घर के आंगन और खेत याद नहीं आते?
हमें तो सब कुछ याद है
बचपन में तुम्हें
कैसे झूले से गिरकर चोट लगी थी
और पूरा गांव तुम्हें देखने आया था
फिर अंत में मेरे हाथ की मिठाई से तुम शांत हुए थे
क्या तुम आज इतने बड़े बन गए जो
अपने बूढ़े मां बाप तक याद नहीं
कैसे तुम्हारी मां पत्थर तोड़ तोड़कर
तुम्हें पढ़ने के लिए रकम इकट्ठा करती थी
आज भी याद है तुम्हारी वो वादे
आपके बुढ़ापे की लाठी बनूंगा
अंधेरे में आंखों की रोशनी बनूंगा
लेकिन हर वादे तुमने तोड़ डाले
तुम्हारी मां
हर आने जाने वाले को तुम्हारे नाम से पुकारा करती है बेचारी यह नहीं जानती
शौहरत और पैसों की भागदौड़ में
तुम अपने मां बाप का सौदा कर चुके हो
न जाने कौन से शहर में रहते हो
न तुम्हारा पता है और न ही ठिकाना।
©परीक्षित

Saturday, August 8, 2020

नवचेतना



संघर्षों के मध्य जूझकर लक्ष्य समन्वित पाना है ,
अमावस्या की सघन रात्रि तक दीपक हमें जलाना है ।
प्रखर पुरुषार्थ एवं श्रेष्ठ सेवा की,
नौका हमें बनानी है ।
जन जन के हृदय में अब ,
नवसृजन की ज्योति जलानी है ।

खो रही मानवता आज समाज ,
पर हमें धैर्य ना खोना है ।
नवाचार नित नवउमंग से ,
नवचेतन विकसित करना है ।

नवाचार की नई किरणें ,
जब धरा पर आती हैं ।
नित नूतन धरा में हर क्षण ,
उमंग संजोती जाती है ।

वायु निज नूतन बहे, बहे नीर की धार ,
भूमि नित नूतन सहे, सब जीवों के भार ।
कलरव करते पंछी प्रतिदिन, कहते हैं दिन रात ,
उठो मनुष्यों अब तो जागो, सृजन करो शुरुआत ।

©परीक्षित जायसवाल