ठीक हो? सब ठीक है?
हां जी। बस यूंही आज चाय की जगह कॉफी पी ली। यूं तो कॉफी से कब कि , - वो क्या बोलते हो तुम? हां ! "ब्रेकअप" हो चुका हैं। लेकिन क्या है ना, पड़ोसी के घर से आज ग़ज़ल सुनाई दे रही थी।
ठीक हो? सब ठीक है?
हां जी। बस वह पुरानी चिट्ठियां मिली जो तुमने तुम्हारे प्रेमिओं के लिए लिखे थे। जब पहली बार उन में से एक हाथ में थाम दिया था, मेरा उतरता हुआ चेहरा देखकर हफ्ते भर की खुशी तुम्हारे चेहरे में झलक गई थी। हज़ार कहने के बाद भी मुझे विश्वास होता ही नहीं था कि तुम्हारी प्रेयसि इन्सान नहीं, बल्कि शहरे हैं। अब चिट्ठी क्या, उन शहरों के आसमान का रंग भी तुम्हें याद नहीं।
ठीक हो? सब ठीक है?
हां सब ठीक है। बस तुम्हारी दी हुई आखरी किताब के उपर धूल जम गई है। लेकिन वह साफ करने से डरता हूं मैं। पन्नों के बीच बहुत सारी यादें दफ़न है। आज रहने देते हैं।
ठीक हो? सब ठीक है?
बिल्कुल। बस शाम में जब दुनिया भगवान को याद करती है, मुझे तुम याद आते हो। हंसी भी आती है कभी-कभी, क्योंकि सामने ही तो बैठे रहते हो...✍️
©परीक्षित
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