"चाय की टपरी"
कहते है इंसान को जीने के लिए न्यूनतम तीन मूल आवश्यकताये होती है...रोटी,कपड़ा और मकान।__पर मेरी चार है..रोटी,कपड़ा और मकान के साथ चाय!!
तो ये बात कुछ उनदिनों की है जब गोरखपुर के एक छोटे से किराये के कमरे में ज़िन्दगी जैसे तैसे रफ्तार लिए थी। घर से स्कूल, स्कूल से घर और बीच मे चाय की टपरी, बस इतनी ही मेरी दुनिया थी। स्कूल से घर लौटते समय एक चाय की छोटी दुकान हुआ करती थी, कहने को सिर्फ चाय की दुकान थी लेकिन वहां सुकून, आराम के साथ-साथ सरयू काका के अतीत के किस्से मुफ्त में मिलते थे। काका उस दुकान के मालिक थे..!!
जब भी स्कूल की आखिरी घंटी बजती,मैं थका-हारा सरयू काका के दुकान पर जाता..चाय पीने के साथ-साथ थकान मिटाने।
..........उनकी चाय की मिठास तो याद न रही,पर बाते बड़ी मीठी मीठी करते थे। उनकी उम्र कोई 65 पार होगी।__ कमर थोड़ी झुकी हुई,पोपला मुह, सफेद दाढ़ी,धसी हुए आंखे..!!
बातचीत से पता चला कि उनके परिवार में सिर्फ उनकी बेटी है- सरसतीया ,जो अक्सर दुकान पर हाथ बंटाते हुए दिखती थी!!
शाम को काका के दुकान पर लोगो का जमावड़ा होता था जहाँ राजनीति के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी काफी चर्चा होती थी।..सरयू काका मेरे लिए टूरिस्ट गाइड भी थे। मैं ठहरा उस शहर के लिए अंजान, अजनबी लेकिन काका को शहर का कोना कोना पता था..!!
कुल मिलाकर काका से अच्छी- खासी जान पहचान हो गयी थी। स्कूल की घंटी कभी न भी सुनु लेकिन काका की केतली हमेशा मेरी राह देखती थी।
काका बड़े जिंदादिल इंसान थे,वे अपने जमाने की हर बात बताते..कुछ लोगो के पास सुनाने को कहानिया नही संघर्ष होता है। उनकी बातों से लगता था अतीत में उनके साथ बड़ा हादसा हुआ है या चाय की दुकान खोलना उनकी मजबूरी होगी पर मैंने कभी पूछने की हिम्मत न की।...
.....वे हमेशा कहते जब भी मन अस्थिर हो मेरे पास आ जाना। इस शहर की भीड़ में अकेला महसूस नही होने दूंगा..!!
आज स्कूल से छूटने के बाद मन मे हलचल थी, काका को उनके 10 रुपये देने थे। पिछले शाम पैसे न होने के वजह से मुफ्त में चाय पी ली थी। जान पहचान की वजह से वे कुछ न बोलते। आज उनकी उधारी चुकानी थी!!
जैसे ही दुकान पर हाज़िरी लगाई ,पर ये क्या उनकी दुकान बंद थी। पहले ऐसा कभी नही हुआ था, परिंदे पंख खोलना भूल सकते है लेकिन वो.......!!
घर पहुचा, थकान हावी था, मन मे 10 रुपये का बोझ बढ़ गया था।
अगली शाम फिर स्कूल की आखिरी घण्टी बजने पर छूटा, वही उत्साह लिए दुकान पर गया लेकिन दुकान आज भी बंद थी।यह सिलसिला काफी दिन तक चला। धीरे-धीरे उनकी बाते मस्तिष्क से रिहा हो रही थी!!
आज फिर सुबह जल्दी स्कूल जाना था समय से पहले। शीघ्र ही तैयार होकर स्कूल के लिए निकल पड़ा ,वही रास्ते मे सुकून की दुकान पड़ी। उम्मीद की विपरीत वहा काफी लोग जमा थे,'शायद काफी दिन बाद दुकान खुली होगी इसलिए' सोचकर मैं आगे बढ़ गया चुकि स्कूल के लिए लेट हो रहा था!!
शाम को छुट्टी हुई.. आज मन मे दुगुना,तिगुना, चौगुना उत्साह था..चंद मिनटों में न जाने कितने ख्वाबों की खेती कर ली मैंने। 'आज सबसे पहले पैसे लौटाऊंगा,फिर इतने दिन गायब रहने का कारण पूछुंगा, घंटो समय बिताऊंगा और न जाने क्या क्या!!
जैसे ही दुकान नजर के सामने आयी, ये क्या?? दुकान फिर से बंद। आज सुबह ही तो खुली थी। सबकुछ समझ से परे था।।
पास के सब्जीवाले से पूछा,"क्यो भाई, आज काका की दुकान सुबह ही खुली थी,इस समय बंद क्यो??, और जरा अखबार देना" कहकर मैं अखबार पढ़ने लगा।
वह थोड़ा रुआंसा होकर बोला,'काका आज ही सुबह गुजर गए'।
उसे पता नही उसने कितनी आसानी से कह दिया। मेरे आंखों के आंसू अखबार के पन्नों से दोस्ती कर गए। यू तो अखबार में इतनी सारी बुरी खबर छपी थी,पर इस खबर से ज्यादा बुरा और क्या ही हो सकता था।
मैंने अखबार लौटाया,आसमां में देखा ,कुछ मद्धिम तारे नज़र आ रहे थे।..काश! उनमे से कोई तारा टूटता और मैं उनकी ज़िंदगी मांग लेता।
उस 10 रुपये के साथ साथ,सुकून के पल,उनकी कीमती सलाह, उनकी दी हुई खुशिया, मीठी बाते सबका कर्ज़ मेरे उपर था।
12वी का बोर्ड एग्जाम आने वाला था, स्कूल की छुटिया हो गयी थी। काका की यादें अब क्षीण हो रही थी। एक दिन मुझे स्कूल में एडमिट कार्ड लेने जाना था..रास्ते मे सोचा उनकी दुकान के तरफ देखूंगा भी नही, पर आदत से मजबूर आंखें उधर ही घूम गयी।
आश्चर्य का सिर्फ वही ठिकाना रहा, वहा दुकान नही थी। गरीबी अभिशाप के साथ बाप भी बन चुकी थी। उनकी बेटी सरसतीया ने छोटे से तिरपाल पर खिलौने का दुकान कर लिया था..!!
समाज के आम आदमी की सहज सी दिखने वाली मार्मिक कहानी का अंतहस्पर्शी चित्रण। काश इस तस्वीर को बदला जा पाता।
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