अंतर्मन
मैं बुरे वक्त का साथी हूँ
यूँ ही बहती आवाज नही
उलझनों में उलझी
बस छोटी सी बात नही ।
अकेले हो जब जब तुम
हौसला मैंने बढ़ाया है
अंधकार के इस भंवर से
तुम्हे वापस लाया है ।
खोजती रहती है ये आंखे
कुछ नया मिल जाये हर पल
जी लूं जिंदगी बस ऐसे ही
हर नया पल और एक पल
विघ्न सामने जो आती है
मन मानो घबरा जाती है
साथ हो दिल से अगर इसका
चूर चूर हो जाती है ।
भय से भ्रांति और पतन से
जो नित निदान दिलाती है
संघर्षो के मध्य जूझकर
सत्य राह दिखलाती है ।
कष्ट जिसे तुम कहते हो
निश्चित कसना जिसमे तुम्हे
मथ कर जैसे मक्खन
मिला है अवसर, अवश्य तुम्हें ।
मैं अंतर्मन की आवाज हूँ
जो,हर जीव में बसता हूँ
हर एक निर्णय के क्षण
सत्य उजागर करता हूँ
मैं वही अंतर्मन की आवाज हूँ
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